छत्तीसगढ़ की विष्णु देव साय सरकार ने कर्मचारियों के लिए तीन प्रतिशत महंगाई भत्ता स्वीकृत करके देर से ही सही थोड़ी राहत तो दी है। अगर यह रहात 15 दिन पहले घोषित हो जाती तो इस राज्य के कर्मचारियों को तीन दिन की हड़ताल नहीं करनी पड़ती। अब छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी कर्मचारी को 55 की जगह 58प्रतिशत महंगाई भत्ता प्राप्त होगा। कर्मचारियों ने इसके पहले अपनी 11 सूत्रीय मांगों को लेकर जो आंदोलन किया था उसमें पांच मांगे तो ऐसी थी जिसमें केवल आदेश जारी होने थे और बाकी मांगे भी बहुत बड़ी वित्तीय भार से जुड़ी नहीं थी, किंतु पता नहीं क्यों इस पर निर्णय नहीं हुआ। खैर देर आयद, दुरूस्त आयद। बाजार में सुरसा के मुंह की तरह अनियंत्रित बढ़ती महंगाई से कर्मचारियों के हित में यह निर्णय हुआ पता नहीं यह 3 प्रतिशत महंगाई भत्ता बढ़ती हुई महंगाई में कर्मचारियों को कितनी राहत मिलेगी इसका तो पता नहीं, किन्तु सरकार पर जरूर इसका वित्तीय भार 540 करोड़ रुपए पड़ेगा। अभी छत्तीसगढ़ की विष्णु देव सरकार के पास 3 साल बाकी हैं और कर्मचारियों की मांगे ऐसी भी नहीं है कि उनका 3 साल में पूरा ना किया जा सके पर बात वही है कि आप इन मांगों पर कब विचार करते हैं और कैसे इसे पूरा करते हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासनिक विमर्श में एक बार फिर सरकारी कर्मचारियों का मुद्दा केंद्र में आ गया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा राज्य कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (डीए) को केंद्र सरकार के समान 55 प्रतिशत से बढ़ाकर 58 प्रतिशत करने की घोषणा न केवल आर्थिक निर्णय है, बल्कि इसका स्पष्ट राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब बढ़ती महंगाई आम आदमी के साथ-साथ सरकारी कर्मचारियों की वास्तविक आय को भी लगातार दबाव में डाल रही है।
मुख्यमंत्री ने यह घोषणा छत्तीसगढ़ राज्य कर्मचारी संघ के आठवें राज्य सम्मेलन में की। मंच का चयन ही इस बात का संकेत था कि सरकार कर्मचारियों को यह भरोसा दिलाना चाहती है कि वह उनके हितों के प्रति संवेदनशील है। प्रदेश के करीब पाँच लाख सरकारी कर्मचारियों को इस निर्णय से सीधा लाभ मिलेगा और मासिक वेतन में बढ़ोतरी से महंगाई के असर से कुछ हद तक राहत जरूर मिलेगी।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का यह कहना कि देश के कई राज्य आज भी केंद्र के महंगाई भत्ते से पीछे हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ ने केंद्र के बराबर डीए देने का फैसला किया है। सरकार की उस राजनीतिक लाइन को रेखांकित करता है, जिसमें ‘मोदी की गारंटी’ को राज्य स्तर पर लागू करने का दावा किया जाता रहा है। यह घोषणा कर्मचारियों के बीच भरोसे का वातावरण बनाती है, खासकर तब जब लंबे समय से डीए बढ़ोतरी की मांग की जा रही थी।
हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब डीए में बढ़ोतरी हुई हो। इससे पहले भी राज्य सरकार ने अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए 2 और फिर 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी। मार्च 2025 में विधानसभा में पेश बजट के दौरान महंगाई भत्ता 53 प्रतिशत किए जाने की घोषणा की गई थी। उसके बाद अब 3 प्रतिशत की और बढ़ोतरी कर इसे 58 प्रतिशत तक पहुंचाया गया है। सातवें वेतन आयोग के तहत कर्मचारियों को 3 प्रतिशत और छठे वेतन आयोग के तहत कर्मचारियों को 7 प्रतिशत महंगाई भत्ता बढ़ाया गया है, जो 1 मार्च 2025 से लागू हुआ। इसका भुगतान अप्रैल में मार्च की सैलरी के साथ शुरू हो चुका है।
बेशक, इस फैसले का वित्तीय असर भी कम नहीं है। केवल 3 प्रतिशत डीए बढ़ोतरी से ही राज्य सरकार पर सालाना करीब 540 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। वहीं पेंशनभोगियों को 3 प्रतिशत महंगाई राहत देने से लगभग 108 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय आएगा। वित्तीय अनुशासन और राजकोषीय संतुलन की बात करने वाली सरकार के लिए यह एक चुनौती जरूर है, लेकिन कर्मचारी-हितैषी फैसलों की राजनीति में इसे एक आवश्यक कीमत के रूप में देखा जा रहा है।
फिर भी, डीए बढ़ोतरी के बावजूद कर्मचारियों की असंतुष्टि पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। छत्तीसगढ़ कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन ने अपनी 11 सूत्रीय मांगों के जरिए यह स्पष्ट कर दिया है कि महंगाई भत्ता केवल एक हिस्सा है, पूरा समाधान नहीं। फेडरेशन की मांग है कि ‘मोदी की गारंटी’ के अनुरूप कर्मचारियों और पेंशनरों को देय तिथि से ही महंगाई भत्ता और महंगाई राहत दी जाए, न कि विलंब से। साथ ही डीए एरियर्स की राशि को कर्मचारियों के जीपीएफ खाते में समायोजित करने की मांग भी लंबे समय से लंबित है।
वेतन संरचना से जुड़े सवाल भी जस के तस हैं। सभी कर्मचारियों को चार स्तरीय समयमान वेतनमान, सहायक शिक्षकों और सहायक पशु चिकित्सा अधिकारियों को त्रिस्तरीय समयमान वेतनमान देने, तथा लिपिक, शिक्षक, स्वास्थ्य विभाग, महिला-बाल विकास जैसे संवर्गों की वेतन विसंगतियां दूर करने की मांग प्रमुख है। इसके लिए पिंगुआ कमेटी की रिपोर्ट को सार्वजनिक किए जाने की मांग सरकार के सामने एक असहज सवाल खड़ा करती है। क्या सरकार इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का राजनीतिक साहस दिखाएगी?
इसके अलावा प्रथम नियुक्ति तिथि से सेवा गणना, नगरीय निकाय कर्मचारियों को नियमित मासिक वेतन और समयबद्ध पदोन्नति, अनुकंपा नियुक्ति में 10 प्रतिशत सीलिंग में शिथिलीकरण, अर्जित अवकाश नगदीकरण को 300 दिवस तक बढ़ाने और दैनिक-संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए ठोस नीति जैसी मांगें प्रशासनिक संवेदनशीलता की कसौटी हैं।
फेडरेशन की मांगों में प्रदेश में केशलेस सुविधा लागू करने और सभी विभागों में समानता लाते हुए सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष करने जैसी मांगें भी शामिल हैं, जो सरकार की दीर्घकालिक कर्मचारी नीति पर सवाल उठाती हैं। ये मांगें केवल आर्थिक नहीं हैं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और भविष्य की गारंटी से भी जुड़ी हुई हैं।
कुल मिलाकर, महंगाई भत्ते में 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी सरकार के लिए एक सकारात्मक और जरूरी कदम है, जिसने कर्मचारियों को तात्कालिक राहत दी है और सरकार की मंशा का संकेत भी दिया है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इससे कर्मचारियों की वर्षों पुरानी संरचनात्मक और नीतिगत मांगें पूरी नहीं होतीं। डीए बढ़ोतरी अगर राहत है, तो शेष मांगें अभी भी इंतजार में खड़ी हैं।
अब असली परीक्षा यह है कि सरकार इस फैसले को केवल एक घोषणा तक सीमित रखती है या इसे कर्मचारी-हितैषी नीतियों की निरंतर श्रृंखला की शुरुआत बनाती है। क्योंकि महंगाई भत्ता राहत दे सकता है, भरोसा नहीं और भरोसा वही सरकार जीतती है, जो घोषणाओं से आगे जाकर ठोस फैसले ले।