ठीक नहीं है मिट्टी की तबियत…

फसल में घटा रहे पोषक तत्व,कम हो रहे नाइट्रोजन और कार्बन

राजकुमार मल

भाटापारा- 73% नमूनों में नाइट्रोजन की कमी और 53% सैंपल में कार्बनिक कार्बन का स्तर कम पाया गया। यह स्थिति गिरती मृदा स्वास्थ्य को प्रमाणित करती है। सीधा असर तैयार फसल में कमजोर और घटते पोषक तत्वों के रूप में देखा जा रहा है।

राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य कार्य योजना के अंतर्गत किए गए परीक्षण रिपोर्ट में हुए इस खुलासे के बाद कृषि वैज्ञानिक चिंता में हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के लिए रिपोर्ट इसलिए चिंता का विषय मानी जा रही है क्योंकि एक ही प्रकार की खेती, असंतुलित पोषक प्रबंधन और असंतुलित उर्वरक का प्रयोग छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा है। भले ही स्वाभाविक उत्पादकता अपने स्तर पर बनी हुई है लेकिन मिट्टी की उत्पादकता और उर्वरता पर दबाव चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुका है।


स्तर कम, कार्बनिक कार्बन का

मिट्टी की उर्वरता का महत्वपूर्ण संकेतक कार्बनिक कार्बन है। यह जल धारण क्षमता बढ़ाता है। नाइट्रोजन की मात्रा, पोषक तत्वों की मौजूदगी निश्चित करता है लेकिन प्रदेश की मिट्टी से यह दोनों प्रमुख तत्व तेजी से कम हो रहे हैं। असंतुलित हो चुके पोषक प्रबंधन की वजह से सीधा दबाव उर्वरता पर पड़ रहा है इसके पीछे बड़ी वजह धान आधारित एकल कृषि प्रणाली को माना जा रहा है।


इसलिए बिगड़ रहा मृदा स्वास्थ्य

कन्हार,डोरसा, मटासी और भाठा। छत्तीसगढ़ की खेतीहर भूमि इन मिट्टियों से युक्त है। उत्पादकता स्वाभाविक रूप से अच्छी है लेकिन धान आधारित एकल कृषि प्रणाली अपनाई जा रही है। इसकी वजह से एक ही प्रकार के पोषक तत्व का दोहन सबसे ज्यादा हो रहा है। यह न केवल जैव- विविधता को नुकसान पहुंचा रही है बल्कि पोषक संतुलन क्षमता को भी कमजोर कर रही है। फलस्वरुप कार्बनिक पदार्थ की मानक मात्रा भी तेजी से कम होने की जानकारी सामने आई है। इसके साथ यूरिया जैसे रासायनिक उर्वरक के असंतुलित प्रयोग को भी बड़ी वजह माना जा रहा है।


खाद्यान्नों की गुणवत्ता पर असर

मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी का असर सीधे खाद्यान्नों की गुणवत्ता पर देखा जा रहा है। जिंक, आयरन, आयोडीन, विटामिन ए, बी और विटामिन डी के साथ-साथ फोलिक एसिड की कमी जैसी जानकारियां प्रमाणित हो चुकीं हैं। इसकी वजह से व्यक्ति बाहर से स्वस्थ एवं सामान्य तो दिखाई देता है लेकिन शरीर में जरूरी पोषक तत्व की गंभीर कमी बनी रहती है। इसे कृषि वैज्ञानिकों के बीच ‘हिडन हंगर’ के नाम से पहचाना जाता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी, एनीमिया और बार-बार होने वाले संक्रमण इसकी सामान्य पहचान हैं।

टिकाऊ खेती और कृषि वानिकी की जरूरत

मृदा स्वास्थ्य किसी भी कृषि प्रणाली की आधारशिला है। यदि मिट्टी में कार्बनिक कार्बन और नाइट्रोजन का स्तर लगातार घटता है, तो इसका सीधा प्रभाव फसल उत्पादन, खाद्यान्न गुणवत्ता तथा मानव पोषण पर पड़ता है। छत्तीसगढ़ में धान आधारित एकल फसल प्रणाली और रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। मृदा की उर्वरता बनाए रखने के लिए कृषि वानिकी, फसल विविधीकरण, हरी खाद, जैविक खाद तथा फसल अवशेषों के पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना आवश्यक है। आज आवश्यकता केवल अधिक उत्पादन की नहीं, बल्कि पोषण-सुरक्षित और टिकाऊ कृषि प्रणाली विकसित करने की है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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