प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन (डीएलएड) के उन हजारों अभ्यर्थियों की उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है जो एक ही विषय में तीन बार फेल होने के बाद चौथे अवसर की मांग कर रहे थे। कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि शिक्षा की गुणवत्ता के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।
न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जो अभ्यर्थी अपनी स्वयं की परीक्षा उत्तीर्ण करने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने राज्य सरकार की विशेष अपील को स्वीकार करते हुए एकल पीठ के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें फेल छात्रों को दोबारा परीक्षा में बैठने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। हम मासूम बच्चों का भविष्य उन शिक्षकों के हवाले नहीं कर सकते जो स्वयं को बार-बार साबित करने में विफल रहे हैं। सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि सचिव परीक्षा नियामक प्राधिकारी ने पूर्व में कुछ छात्रों को नियमों के विरुद्ध जाकर विशेष अवसर दिए थे। इसी का हवाला देते हुए अन्य छात्रों ने समानता के अधिकार के तहत चौथे मौके की मांग की थी।
इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पूर्व में अधिकारियों ने किसी को नियमों के विरुद्ध जाकर लाभ दिया है, तो अन्य छात्र उसी गलती को दोहराने की मांग नहीं कर सकते। समानता का अधिकार केवल वैध कार्यों के लिए होता है, अवैध कार्यों को दोहराने के लिए नहीं।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि प्रशिक्षुओं को पहले ही पर्याप्त अवसर दिए जा चुके थे और सचिव के पास नियमों को बदलने की कोई वैधानिक शक्ति नहीं है। कोर्ट ने माना कि एनसीटीई के नियम सर्वोपरि हैं और उनके अनुसार दो साल का यह कोर्स अधिकतम तीन साल में पूरा होना अनिवार्य है। सचिव के पास इस समय सीमा को बढ़ाने या अतिरिक्त मौका देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।