कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) के पद को लेकर चल रहा विवाद अब अदालत तक पहुंच चुका है। इस मामले में राज्य सरकार को फिलहाल राहत मिली है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही ऋतब्रत बनर्जी फिलहाल विपक्ष के नेता के पद पर बने रहेंगे।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि इस स्तर पर अदालत को ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला, जिसके आधार पर तत्काल हस्तक्षेप किया जाए। कोर्ट ने सभी पक्षों को अपने-अपने हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को तय की गई है।
क्या है पूरा विवाद?
दरअसल, विधानसभा अध्यक्ष रथिन बसु ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता नियुक्त किया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए तृणमूल कांग्रेस के विधायक और वरिष्ठ नेता शोवनदेब चट्टोपाध्याय ने हाई कोर्ट का रुख किया था। उनका कहना था कि उन्हें विपक्ष का नेता बनाए जाने के समर्थन में पहले ही पत्र सौंपा गया था, लेकिन उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि 9 मई को मिले आवेदन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई, जबकि 3 जून को मिले दूसरे पत्र के आधार पर ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता घोषित कर दिया गया। अदालत ने इस प्रक्रिया को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है।
चुनाव के बाद बढ़ा राजनीतिक विवाद
विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर राजनीतिक खींचतान तेज हो गई थी। पार्टी नेतृत्व ने शोवनदेब चट्टोपाध्याय को विधायक दल का नेता बनाने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, ऋतब्रत बनर्जी ने बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन होने का दावा किया और विपक्ष के नेता के पद पर काबिज हो गए।
इसी बीच कुछ विधायकों ने आरोप लगाया कि स्पीकर को सौंपे गए समर्थन पत्र में उनके फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे। इसके बाद मामला और गंभीर हो गया। यही विवाद अब जांच एजेंसियों की जांच का विषय बना हुआ है। हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है।