- सुभाष मिश्र
पिछले दिनों नई दिल्ली में संपन्न ग्यारहवें रायसीना डायलॉग 2026 में हुए बहुपक्षीय विचार विमर्श के दौरान भारतीय राजनय की दृष्टि से सकारात्मक संकेत मिले हैं। ‘संस्कार : अभिकथन, समायोजन, उन्नति (संस्कार : एसर्शन, एकोमोडेशन, एडवांसमेंट) विषय पर केंद्रित यह संवाद मुख्यत: इस विचार पर केंद्रित था कि सभ्यताएं अपनी पहचान कैसे स्थापित करती हैं, विविधता को अपनाती हैं और प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होती हैं।
‘हार्ट ऑफ द सीज: फ्यूचर ऑफ द इंडियन ओशन थीम पर चर्चा करते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हिंद महासागर के भविष्य और उसमें भारत की भूमिका पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि अगर हमें हिंद महासागर की एक अलग पहचान बनानी है, तो इसे केवल बातों से नहीं बल्कि काम, संसाधनों और बड़े प्रोजेक्ट्स के जरिए साबित करना होगा। भारत आज यही कर रहा है। हम केवल वादे नहीं कर रहे, बल्कि समुद्र के रास्ते व्यापार और सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जमीन पर काम कर रहे हैं।
रायसीना संवाद में ‘रायसीना विज्ञान कूटनीति पहलÓ के अंतर्गत विदेश नीति में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को एकीकृत करने के लिए एक नया ढांचा शुरू करने के मुद्दे पर चर्चा हुई, जिसमें एआई गवर्नेंस, सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला और विकासशील देशों के लिए भारत के डिजिटल सार्वजनिक अधोसंरचना पर ध्यान केंद्रित किया गया। रायसीना संवाद में बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के उदय को स्वीकार किया गया, जिसमें वैश्विक दक्षिण भविष्य की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। इस तथ्य को भी रेखांकित किया गया कि उभरती हुई दक्षिण-पश्चिम साझेदारियाँ और लचीले बहुपक्षीय समूह वैश्विक व्यवस्था को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं।
पिछले एक दशक में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक दिलचस्प परिवर्तन दिखाई दे रहा है। वैश्विक मुद्दों पर चर्चा और नीति-निर्माण के लिए जो मंच कभी यूरोप और अमेरिका के इर्द-गिर्द केंद्रित रहते थे, अब उनका केंद्र धीरे-धीरे एशिया की ओर खिसक रहा है। इसी बदलती दुनिया में भारत ने भी अपना एक ऐसा मंच खड़ा किया है, जो आज वैश्विक विमर्श का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है, यह मंच है रायसीना डायलॉग। इस संवाद की शुरुआत 2016 में हुई थी। इसे भारत के विदेश मंत्रालय और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन मिलकर आयोजित करते हैं। नाम दिल्ली के उस इलाके ‘रायसीना हिलÓ से लिया गया है, जहाँ भारत की सत्ता के प्रमुख संस्थान स्थित हैं। लेकिन कुछ ही वर्षों में यह आयोजन केवल भारत का नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीतिक और रणनीतिक विमर्श का एक प्रमुख मंच बन गया है। हर वर्ष मार्च में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में दुनिया के दर्जनों देशों के विदेश मंत्री, सैन्य अधिकारी, नीति-निर्माता, उद्योगपति और थिंक-टैंक विशेषज्ञ एक साथ बैठकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और तकनीक से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते हैं।
दुनिया में पहले से कई बड़े वैश्विक मंच मौजूद हैं। उदाहरण के लिए स्विट्जरलैंड में होने वाला विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक और चीन में आयोजित बोआओ फोरम फॉर एशिया लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चर्चा के प्रमुख केंद्र रहे हैं। लेकिन इन मंचों को लेकर समय-समय पर आलोचना भी होती रही है। दावोस सम्मेलन को अक्सर यह कहकर आलोचना का सामना करना पड़ता है कि वहाँ वैश्विक कॉरपोरेट और आर्थिक अभिजात वर्ग का प्रभाव ज्यादा रहता है, जबकि बोआओ फोरम को कई लोग चीन की नीतियों के समर्थन का मंच मानते हैं। ऐसे समय में रायसीना डायलॉग एक अपेक्षाकृत खुला और बहु-पक्षीय मंच बनकर उभरा है, जहाँ विभिन्न देशों के प्रतिनिधि अपेक्षाकृत स्वतंत्र ढंग से अपनी बात रख सकते हैं।
यही कारण है कि दुनिया के कई वरिष्ठ राजनेता और रणनीतिकार इस मंच को गंभीरता से लेने लगे हैं। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी एल्बॉट ने भी इस सम्मेलन को लेकर टिप्पणी की है। उनका कहना है कि रायसीना डायलॉग आज दुनिया के महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों में से एक बन चुका है और कई मायनों में यह दावोस और बोआओ जैसे मंचों से अलग और अधिक प्रभावी दिखाई देता है। एबॉट का यह भी मानना है कि यह सम्मेलन केवल चर्चा का मंच नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि भारत अब वैश्विक राजनीति में एक अधिक सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभाने की ओर बढ़ रहा है।
दरअसल यह परिवर्तन केवल किसी एक सम्मेलन की सफलता भर नहीं है। इसके पीछे पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति में आए बदलाव भी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी सक्रियता बढ़ाई है। भारत ने एक ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत किया है, तो दूसरी ओर रूस और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ भी अपने संबंधों को बनाए रखा है। यह संतुलित कूटनीति भारत को ऐसी स्थिति में ले आई है जहाँ वह विभिन्न वैश्विक ध्रुवों के बीच संवाद का सेतु बन सकता है।
इसी संदर्भ में रायसीना डायलॉग का महत्व और बढ़ जाता है। यह मंच केवल सरकारों का सम्मेलन नहीं है, बल्कि यहाँ नीति-निर्माता, सैन्य रणनीतिकार, पत्रकार, तकनीकी विशेषज्ञ और उद्योग जगत के प्रतिनिधि भी खुलकर विचार साझा करते हैं। इससे यह संवाद केवल कूटनीतिक औपचारिकता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भविष्य की वैश्विक नीतियों के संकेत भी देता है।
आज दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ भू-राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं। एक ओर अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, दूसरी ओर कई क्षेत्रीय संघर्ष भी वैश्विक राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में ऐसे मंचों की आवश्यकता और बढ़ जाती है जहाँ विभिन्न देशों के बीच खुलकर संवाद हो सके। रायसीना डायलॉग इसी जरूरत को पूरा करने का प्रयास करता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि यह मंच केवल पश्चिमी दुनिया तक सीमित नहीं है। इसमें एशिया, अफ्रीका, यूरोप और लैटिन अमेरिका के देशों की भागीदारी होती है। इससे यह वास्तव में बहुध्रुवीय दुनिया के विचार को प्रतिबिंबित करता है। भारत लंबे समय से ‘ग्लोबल साउथÓ की आवाज बनने की बात करता रहा है, और यह मंच उस विचार को भी एक ठोस रूप देता दिखाई देता है। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी एबॉट की टिप्पणी भी इसी व्यापक संदर्भ में समझी जानी चाहिए। उनका संकेत केवल सम्मेलन की प्रशंसा तक सीमित नहीं है। वह यह भी बताता है कि दुनिया के कई रणनीतिकार अब भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखने लगे हैं जो आने वाले समय में वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
हालाँकि यह भी सच है कि किसी भी मंच की वास्तविक ताकत केवल उसके आयोजनों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि उससे निकलने वाले विचार और पहलें अंतरराष्ट्रीय राजनीति को कितना प्रभावित करती हैं। रायसीना डायलॉग अभी अपेक्षाकृत नया मंच है और उसे अपनी विश्वसनीयता और प्रभाव को और मजबूत करना होगा। लेकिन जिस तेजी से इसकी पहचान और भागीदारी बढ़ रही है, उससे यह संकेत जरूर मिलता है कि भारत वैश्विक विमर्श में अपनी जगह बना रहा है।
अंतत: रायसीना डायलॉग केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि उस बदलती वैश्विक व्यवस्था का प्रतीक है जिसमें भारत की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। अगर आने वाले वर्षों में यह मंच संवाद, सहमति और सहयोग की दिशा में ठोस पहल कर पाता है, तो संभव है कि यह वास्तव में उन कुछ वैश्विक मंचों में शामिल हो जाए जहाँ से आने वाले समय की विश्व राजनीति की दिशा तय होती है।