-सुभाष मिश्र
अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई, राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और उन्हें न्यूयॉर्क ले जाए जाने की घटनाएँ केवल एक देश की सत्ता-परिवर्तन कहानी नहीं हैं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था पर सीधा सवाल है, जिसे अब तक संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुपक्षीय सहमति का ढांचा माना जाता रहा है। ड्रग्स के आरोप, लोकतंत्र की दुहाई और स्थिरता के वादेइन सबके बीच जो तस्वीर उभरती है, वह कहीं अधिक गहरी और चिंताजनक है। यह एक ऐसे दौर का संकेत है जहाँ ताकत, संसाधन और वर्चस्व, कानून और सहमति से ऊपर रखे जा रहे हैं।
जिस तरह से सैन्य हमले, सैकड़ों फाइटर जेटऔर एक सत्तारूढ़ राष्ट्रपति को हथकड़ी लगाकर, आंखों पर पट्टी बांधकर किसी तीसरे देश ले जाया गया, वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय मानक में न्यायिक प्रक्रिया नहीं कहलाती। यदि यही कृत्य किसी और शक्ति द्वारा किया जाता, तो उसे अपहरण, आक्रामकता और अंतरराष्ट्रीय अपराध कहा जाता। लेकिन जब यह अमेरिका करता है, तो शब्द बदल जाते हैं—लॉ एनफोर्समेंट एक्शन, टार्गेटेड ऑपरेशन और लोकतांत्रिक संक्रमण। यही दोहरा मापदंड आज की वैश्विक राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है।
ड्रग्स को बहाना बनाकर सत्ता परिवर्तन की रणनीति नई नहीं है। पनामा से लेकर मध्य पूर्व तक इतिहास गवाह है कि जब भी किसी देश के प्राकृतिक संसाधन—तेल, गैस या खनिज—वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने लगते हैं तो नैरेटिव बदल जाता है। वेनेजुएला के मामले में भी असली प्रश्न ड्रग्स नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक पर नियंत्रण का है। मादुरो शासन के दौरान यह तेल अमेरिकी कंपनियों के बजाय चीन और रूस के साथ साझेदारी में रहा। यही वह बिंदु है जहाँ भू-राजनीति और अर्थनीति एक-दूसरे में घुल जाती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति का यह कहना कि वेनेजुएला में तेल के इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक किया जाएगा और अस्थायी प्रशासन की भूमिका निभाई जा सकती है, अपने आप में खतरनाक संकेत है। यह भाषा सुधार की नहीं, बल्कि नियंत्रण की है। जब मुनाफे की शर्तें बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ तय करें और संसाधनों का लाभ स्थानीय जनता तक पहुँचने से पहले वैश्विक बाजारों में बंट जाए तो ऐसे हस्तक्षेप को परोपकार नहीं कहा जा सकता। यह संसाधन-राजनीति है, जिसमें लोकतंत्र एक आवरण भर बन जाता है।
पूरी दुनिया की प्रतिक्रिया भी इस संकट की गंभीरता को उजागर करती है। लैटिन अमेरिका और वैश्विक दक्षिण में इसे संप्रभुता का खुला उल्लंघन माना जा रहा है। ब्राज़ील, मेक्सिको, क्यूबा जैसे देशों की आपत्ति केवल मादुरो के समर्थन में नहीं, बल्कि उस डर से उपजी है कि आज वेनेजुएला है, कल कोई और हो सकता है। रूस और चीन की नाराजग़ी भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए यह सिर्फ एक देश का मुद्दा नहीं, बल्कि उस शक्ति-संतुलन का सवाल है जो पिछले दो दशकों में बदल रहा था।
पश्चिमी मीडिया का बड़ा हिस्सा इस पूरे घटनाक्रम को लोकतंत्र की जीत के रूप में पेश कर रहा है, जबकि दृश्य और तथ्य कुछ और ही कहानी कहते हैं। यह अंतर बताता है कि सूचना और विमर्श भी अब शक्ति के उपकरण बन चुके हैं। वहीं, कई देश चुप है यह चुप्पी सहमति नहीं, भय की उपज है। प्रतिबंधों, आर्थिक दबाव और कूटनीतिक अलगाव का डर आज भी उतना ही प्रभावी हथियार है जितना सैन्य बल।
सबसे बड़ा प्रश्न भविष्य का है। यदि किसी संप्रभु देश के राष्ट्रपति को इस तरह उठाया जाना सामान्य बना दिया गया तो अंतरराष्ट्रीय कानून का क्या अर्थ रह जाएगा? क्या यह एक नया मानक बन जाएगा कि संसाधन-समृद्ध लेकिन राजनीतिक रूप से असहज देशों में इसी तरह हस्तक्षेप होगा? यह स्थिति दुनिया को युद्ध की नहीं, लेकिन स्थायी अस्थिरता की ओर जरूर ले जाती है एक ऐसे नए शीत युद्ध की ओर, जहां लड़ाइयां सीधे नहीं, बल्कि प्रॉक्सी, प्रतिबंध और सत्ता परिवर्तन के जरिए लड़ी जाएगी।
भारत सहित जिन देशों ने संतुलित प्रतिक्रिया दी है, वे शायद यही समझते हैं कि समाधान सैन्य प्रभुत्व से नहीं निकलेगा। असली रास्ता संवाद, बहुपक्षीय मंचों और स्थानीय जनता की राजनीतिक इच्छा के सम्मान से होकर जाता है। वेनेजुएला की जमीन पर जो हुआ वह इतिहास में केवल एक घटना के रूप में दर्ज नहीं होगा, बल्कि एक चेतावनी की तरह याद रखा जाएगा कि दुनिया किस मोड़ पर खड़ी थी और उसने कानून को चुना या ताकत को।
आखिरकार सवाल वेनेजुएला का नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था का है। अगर आज तेल, ड्रग्स या लोकतंत्र के नाम पर एक देश को रौंदा जा सकता है, तो कल कोई भी राष्ट्र सुरक्षित नहीं रहेगा। यही वह क्षण है जहां दुनिया को तय करना है कि भविष्य संवाद से बनेगा या डर से, नियमों से चलेगा या बंदूकों से।
ड्रग्स का बहाना, तेल असली निशाना?

05
Jan