भारत ही एक ऐसा देश है जो संस्कृति और धर्म को लेकर विविधताओं से भरा है । विविध धार्मिक मान्यताएं , अनेक परंपराएं , भिन्न-भिन्न जीवन शैलियां , अनेक संस्कृतियां , भाषा – बोलियां , लिपियां यही वह सारी चीजें हैं , यही वह सारी बातें हैं जो भारत को एक बहुसांस्कृतिक राष्ट्र में बदलती है । और एक बड़ी पहचान देती है ।
यह बात आज की जनधारा के प्रधान संपादक सुभाष मिश्र ने कलिंगा यूनिवर्सिटी में भारतीय भाषा समिति (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) एवं कलिंगा विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय भाषा परिवार: नए क्षितिज, नई दृष्टि और भाषाई एकता का भविष्य” विषय पर दो दिवसीय दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में कही । सुभाष मिश्र ने भारतीयता , बहुसंस्कृतिकता और राष्ट्रीयता बोलते हुए कहा कि भारतीय भाषा परिवार पर कोई भी विमर्श तब तक अपूर्ण रहता है, जब तक सिद्धांत, अनुसंधान और नीति आपस में संवाद नहीं करते ।

भारत एक देश है , जिसको सिर्फ नक्शे में देखकर नहीं समझा जा सकता है। भारत और भारतीयता को समझने के लिए उसे समग्रता में देखना होगा । यह सभ्यता की एक लंबी परंपरा है । संस्कृति की विस्तृत अवधारणा है ।
संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वन निरंतर परिवर्तनशील है । संस्कृति जड़ नहीं है ।* भारतीय सभ्यता का जो एक विकसित और चमकता हुआ रूप नजर आता है , वह संस्कृति की इस निरंतर परिवर्तनशीलता का ही कारण है । भारतीय संस्कृति को जो जहां से भारतीयता के संदर्भ में बेहतर लगा वहां से ग्रहण किया ।हमने अंग्रेजों से व्यवहार सीखा लेकिन उनके संस्कार नहीं । यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है । अंग्रेजी राज में वेशभूषा में बदलाव आया लेकिन भारतीय सभ्यता में नहीं आया । क्षमा , दया , परोपकार ,सहिष्णुता ,अहिंसा यह हमने पाँच हजार साल की संस्कृति के निरंतरता में बचाए रखा । यही कारण है कि भारत पर कभी आक्रमणकारी होने के आरोप नहीं लगे । वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा को आज पूरा विश्व स्वीकार करने लगा है । आधुनिकता हमारे विचारों में है । हमारे आविष्कारों में है । हमारे विकास की अवधारणा में है । हम आधुनिक हुए लेकिन विचारों में हुए । हमने धर्म के मूल उद्देश्य और विचारों को पृथक नहीं किया ।

श्री सुभाष मिश्र ने बहुसांस्कृतिकता* पर बोलते हुए कहा कि
भारत और भारतीयता की बड़ी पहचान है । जिसे विश्व भी अचरज के साथ देखता है । भारत में अनेक धर्म हैं । अनेक संस्कृतियां है । लेकिन कहीं भी एक दूसरे को लेकर अतिक्रमण नहीं है । जो थोड़े बहुत अलगाव हैं वह दुनिया भर में हैं । पश्चिम में भी गोरे और काले का भेद है । और वहां का नस्ल भेद आज भी नहीं जा पा रहा है । तो इस तरह की सांप्रदायिकता दुनिया भर में है । हमारे यहां भी है । लेकिन उससे हमारी संस्कृति या कहे बहुसांस्कृतिकता के मूल अथाँ को कभी ठेस नहीं पहुंची । हजारों साल से अनेक धर्म और अनेक संस्कृतियां भारत में सह अस्तित्व के साथ मौजूद है ।
जहां तक राष्ट्रीयता* की बात है तो दरअसल भारतीयता , संस्कृति , बहु सांस्कृतिकता और राष्ट्रीयता आपस में बहुत गहरा संबंध रखते हैं । एक दूसरे से जुड़े हुए पद हैं । इनको पृथक रूप में नहीं देखा जा सकता है । ना समझा जा सकता है । जो ऐसी कोशिश करते हैं उनके पास विचारों का भटकाव आ जाता है ।हमारी राष्ट्रीयता का एक सबसे बड़ा रूप यही है कि यहां सभी भाषाओं , धर्म , संस्कृतियों को समान अधिकार और एक जैसा सम्मान हासिल है जो विश्व में और कहीं बहुत मुश्किल से नजर आता है ।

समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए, कलिंगा विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आर. श्रीधर ने भारतीय भाषा परिवार के उद्देश्यों के बारे में विस्तार से बताया सभी आमंत्रित वक्ताओं को उनके बहुमूल्य योगदान के प्रति सम्मान स्वरूप स्मृति-चिह्न, शॉल एवं प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। सभी प्रतिभागियों को किट, नोटबुक एवं सहभागिता प्रमाण पत्र वितरित किए गए। कार्यक्रम का समापन संयोजक डॉ. ए. राजशेखर द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने इस राष्ट्रीय सम्मेलन को सार्थक एवं सफल शैक्षणिक आयोजन बनाने हेतु अतिथियों, वक्ताओं, आयोजकों तथा प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।