मे-चांग के तेल से बनेगा प्राकृतिक मच्छर प्रतिरोधक

अब छत्तीसगढ़ में औषधीय वृक्षों पर शोध की योजना

राजकुमार मल

भाटापारा- मे-चांग या लिट्सिया क्यूबेबा नाम है उस वृक्ष का जिसकी पत्तियों और फलों में मिलने वाले तेल से मच्छर प्रतिरोधक बनाए जा सकेंगे। इस सफलता के बाद अब छत्तीसगढ़ में मिलने वाले औषधीय वृक्षों में संभावनाएं खोजे जाने की तैयारी है।

नहीं होगी त्वचा और आंखों में जलन। एलर्जी तथा श्वसन संबंधी दुष्प्रभाव जैसी स्वास्थ्यगत परेशानी भी नहीं होगी क्योंकि इसके तेल में हानिकारक यौगिक नहीं होने की जानकारी सामने आई है। इस जानकारी के बाद इसे रासायनिक मच्छर प्रतिरोधक का पर्यावरण अनुकूल प्राकृतिक विकल्प माना जा रहा है।


जानिए लिट्सिया क्यूबेबा को

लिट्सिया क्यूबेबा लाॅरेसी कुल का एक सुगंधित वृक्ष है। इसकी पत्तियों एवं फूलों में मुख्य रूप से सिट्रन और लियोनिन जैसे वाष्पशील यौगिक होते हैं। यह दोनों अनेक कीटों को दूर रखने में सहायक है। अनुसंधान के दौरान 6% सांद्रता वाला ऐसा तेल तैयार हुआ जिसकी मदद से डेंगू एवं जीकावाहक मच्छर, मलेरिया वाहक मच्छर तथा फाइलेरिया वाहक मच्छरों को इस तेल के छिड़काव के बाद 4 घंटे तक दूर रखा जा सकता है।


इसलिए प्राकृतिक प्रतिरोधक

वर्तमान में व्यापक रूप से उपलब्ध रासायनिक रिप्लेंट प्रभावी तो हैं लेकिन लंबे समय तक उपयोग से स्वास्थ्य संबंधित शिकायतें बराबर बनी हुई है। जिसमें आंखों में जलन, त्वचा संबंधी, श्वसन संबंधी परेशानियां मुख्य हैं। बड़े स्तर पर मैदानी परीक्षण की आवश्यकता इसलिए मानी जा रही क्योंकि इसका प्रभाव रासायनिक उत्पाद की तुलना में कम समय तक रहता है। इसलिए बेहतर फॉर्मूलेशन के विकास की योजना तैयार की जा रही है।


छत्तीसगढ़ के लिए इसलिए महत्वपूर्ण

नई खोज को छत्तीसगढ़ के लिए बेहद अहम इसलिए माना जा रहा है क्योंकि मानसून के दौरान डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां तेजी से फैलतीं हैं। ऐसे में पौधों पर आधारित सुरक्षित मच्छर प्रतिरोधक विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकता है। इस सफलता के बाद स्थानीय औषधिय एवं सुगंधित पौधों में अनुसंधान की संभावना की राह आसान होती नजर आ रही है। इनमें नीम, लेमनग्रास, तुलसी और सिट्रोनेल जैसी प्रजातियां मुख्य हैं।

सुरक्षित मच्छर प्रतिरोधकों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

लिट्सिया क्यूबेबा पर हुई यह खोज प्राकृतिक और सुरक्षित मच्छर प्रतिरोधकों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। छत्तीसगढ़ की औषधीय एवं सुगंधित वनस्पतियों पर इसी प्रकार का अनुसंधान जनस्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय आजीविका—तीनों के लिए नए अवसर खोल सकता है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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