कम उत्पादन ने बढ़ाई सुपर फूड मखाना की कीमत

व्यावसायिक खेती छोड़ रहे किसान

राजकुमार मल

भाटापारा- 800 से 1400 रुपए किलो। जा सकता है 1000 से 1600 रुपए किलो पर। यह इसलिए क्योंकि मखाना की व्यावसायिक खेती से दूरी बना रहे हैं मखाना किसान।

बिहार का मिथिला, कोसी और सीमांचल क्षेत्र मखाना की खेती को लेकर भले ही प्रसिद्ध है लेकिन अब यह तीनों, कम उपज देने वाली मखाना की खेती छोड़ रहे हैं क्योंकि बोनी से लेकर तैयार होने तक की हर प्रक्रिया हाथों से ही पूरी करनी पड़ती है।


इसलिए किसान कर रहे किनारा

मखाना की खेती मुख्य रूप से तालाबों में की जाती है। बेहद शारीरिक श्रम की जरूरत, तैयार फसल की कटाई के वक्त होती है। गहरे पानी और कीचड़ में, परिपक्व हो चुके बीजों को हाथों से चुनना होता है। निकाले गए बीजों को कई चरणों में सुखाना, भूनना और निर्धारित तापमान में फोड़ना पड़ता है। यह प्रक्रिया इसलिए बेहद कठिन है क्योंकि मखाना निकालने की अंतिम प्रक्रिया के दौरान अत्यधिक धुंआ और तेज गर्मी का सामना करना पड़ता है।


बेहद कमजोर उत्पादन

पानी में उगने वाले मखाना के बीजों का छिलका बेहद कठोर होता है। इन्हें अलग करने की प्रक्रिया में बहुत अपशिष्ट निकलता है। यह उत्पादन लागत को बढ़ाती है जबकि तैयार मखाना की मात्रा अपेक्षाकृत बेहद कम होती है। यह ऐसी दूसरी वजह है, जिससे बिहार के मिथिला, कोसी और सीमांचल क्षेत्र के मखाना की खेती करने वाले किसान मखाना की खेती से किनारा करने के लिए विवश हैं।


इसलिए बढ़ रही मांग

मखाना में कैल्शियम, मैग्नीशियम और प्रोटीन जैसे कई उच्च पोषक तत्व होते हैं। यह तत्व इसे सुपर फूड का दर्जा देते हैं। यह औषधीय तत्व ही मखाना को अमेरिका, यूएई और कई पड़ोसी देशों में पहुंचाएं हुए हैं। बताते चले कि विश्व में मखाने के कुल उत्पादन में 80 से 90% हिस्सेदारी अकेले बिहार की है लेकिन नई स्थितियां किसानों एवं उपभोक्ताओं पर बेहद भारी पड़ रही है।

संकट का समाधान है तकनीकी नवाचार और क्षेत्रीय विस्तार

मखाना केवल एक पारंपरिक फसल नहीं, बल्कि उच्च पोषण और औषधीय गुणों वाला एक महत्वपूर्ण “सुपर फूड” है, जिसकी वैश्विक मांग लगातार बढ़ रही है। पारंपरिक उत्पादक क्षेत्रों में श्रम की कमी, कठिन उत्पादन प्रक्रिया और कम लाभप्रदता के कारण किसान इसकी खेती से दूर हो रहे हैं, जिससे भविष्य में कीमतों में और वृद्धि संभव है। इस चुनौती को अवसर में बदलने के लिए मखाना उत्पादन में यंत्रीकरण, प्रसंस्करण तकनीकों का आधुनिकीकरण तथा नए क्षेत्रों में इसकी वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देना आवश्यक है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर (छ.ग.)

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