प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट के चर्चित ‘कैश-एट-होम’ मामले में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को भेज दिया है। उनके सरकारी आवास पर बड़ी मात्रा में जले हुए नोट मिलने के बाद वे विवादों में घिरे थे। माना जा रहा है कि संसद में चल रही महाभियोग (पद से हटाने की प्रक्रिया) की कार्यवाही से बचने के लिए उन्होंने यह कदम उठाया है।
क्या है पूरा मामला? (बैकग्राउंड)
यह विवाद तब शुरू हुआ जब जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर भारी मात्रा में अधजले नोट बरामद हुए। हालांकि, जस्टिस वर्मा ने इन नोटों को अपना मानने से साफ इनकार कर दिया था। इस घटना के बाद हड़कंप मच गया और सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई। समिति की शुरुआती रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए थे।
महाभियोग की तलवार और कानूनी लड़ाई
इस्तीफा न देने पर यह मामला प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक पहुंचा। इसके बाद संसद में उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई। 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उनके खिलाफ प्रस्ताव स्वीकार कर एक जांच समिति बना दी थी। जस्टिस वर्मा ने इस कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी, लेकिन वहां से उन्हें कोई राहत नहीं मिली। कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी।
भावुक पत्र और भविष्य की राह
राष्ट्रपति को भेजे अपने पत्र में जस्टिस वर्मा ने लिखा, “मैं इस गरिमामय कार्यालय पर उन कारणों का बोझ नहीं डालना चाहता, जिन्होंने मुझे यह कदम उठाने पर विवश किया है। गहरे दुख के साथ मैं तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे रहा हूं।”