पहल सम्मान और मैं


एक और वह शख्स जिसके शब्दों में लय एवं सुर की मिठास होती थी। ऊर्जावान, साहित्यिक यात्रा का निर्वाहन करने वाला शख्स नहीं रहा।
मेरे लिए ज्ञान रंजन जी वह शख्सियत थे जिन्होंने मेरे संगीत की यात्रा में गति दी। “पहल सम्मान “के माध्यम से जिन कवियों /साहित्यकारों को यह सम्मान प्राप्त हुआ उनमें मेरा भी हस्तक्षेप रहता। ज्ञान जी लंबे समय से विवेचना रंग मंडल के संरक्षक एवं मार्गदर्शन के रूप में सदैव रहे हैं। जिस किसी कवि उपन्यासकार को पहल सम्मान उसकी जन्मभूमि या कर्मभूमि में प्राप्त होता, तब यह सम्मान एक वृहद आयोजन के रूप में हमेशा संपन्न होता आया है।पहल सम्मान देश भर में बहुत चर्चित सम्मान हुआ करता था,मानो साहित्य का कुंभ था।पूरे देश से बड़े-बड़े साहित्यकार पत्रकार विद्वान हिस्सा लेना गौरवपूर्ण समझते थे। विवेचना रंगमंडल को उस कवि की कविताओं पर एक कविता कोलाज संगीतमय नाट्य प्रस्तुति देने का अवसर वे हमेशा दिया करते थे।
विवेचना रंग मंडल ने पहल सम्मान के अंतर्गत उदय प्रकाश,आलोक धन्वा, ज्ञानेंद्रपति आदि कवियों की कविताओं पर केंद्रित संगीतमय नाट्य प्रस्तुति की है। जिसमें मुझे इन कवियों की अनेकों कविताएं संगीतबद्ध करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और यह कविताएं हम आज भी गाहे-बगाहे किसी न किसी कार्यक्रम में हमेशा प्रस्तुत करते रहते हैं। यह मेरे लिए एक बहुत बड़ी पूंजी है, या यूँ कहें कि मेरे बायोडाटा का एक बहुत अहम हिस्सा यह पहल सम्मान रहा है।


जब नागपुर में उदय प्रकाश जी को यह सम्मान मिला तो उनकी एक कविता है “हम हैं ताना हम हैं बाना “यह कविता ज्ञान जी को इतनी पसंद आई कि उन्होंने आगे के समस्त पहल सम्मान में इस गीत को कार्यक्रम का प्रारंभिक गीत बना दिया। उदय प्रकाश एवं इसके बाद के कवियों की कविताएं या फिर गुलजार जी का “रेशम का शायर “तक मेरे इस काव्य संगीत यात्रा में “पहल सम्मान” एक अहम हिस्सा रहा है।नाट्य समारोह एवं अनेकों साहित्यिक कार्यक्रमों का वे एक अहम हिस्सा हुआ करते थे। उनकी उपस्थिति से उस कार्यक्रम की गरिमा बढ़ जाती थी साथ ही उस कार्यक्रम का स्टेटस भी तय हो जाता था। अरुण दादा के साथ या कभी अपनी माता जी के साथ उनके निवास पर मैं अक्सर जाया करता था एवं किसी न किसी साहित्यिक सांस्कृतिक या नाटक आदि विषय पर जो वार्ताएँ हुआ करती थी, उनको सुनना मेरे लिए एक सुखद एहसास हुआ करता था। वे मेरे इस काव्य संगीत से भली भांति परिचित थे एवं दिल से इस अनूठे काम की हमेशा तारीफ करते थे। ज्ञानरंजन जी का करीब से सानिध्य जिनको भी प्राप्त हुआ वे अपने आप को सौभाग्यशाली समझते हैं।
सादर श्रद्धांजलि….
सुयोग पाठक

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