–सुभाष मिश्र
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुशासन केवल प्रशासनिक दक्षता का विषय नहीं होता, बल्कि यह जनता के प्रति संवेदनशीलता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की संस्कृति से जुड़ा होता है। जब सरकार स्वयं नागरिकों तक पहुँचकर उनकी समस्याएँ सुनती है और समाधान के लिए सक्रिय पहल करती है, तब लोकतंत्र अधिक जीवंत और विश्वसनीय बनता है। इसी दृष्टि से छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा संचालित ‘सुशासन तिहारÓ जनकल्याण और लोकसंवाद की एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है।
सुशासन तिहार का उद्देश्य शासन और जनता के बीच दूरी को कम करना तथा प्रशासन को गाँव-गाँव तक पहुँचाना है। इस अभियान के माध्यम से विभिन्न विभागों के अधिकारी सीधे जनता से संवाद करते हैं और उनकी समस्याओं, शिकायतों तथा जरूरतों को सुनते हैं तथा जहाँ तक संभव होता है, उनका मौके पर ही निराकरण करते हैं। इससे आम नागरिकों को अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के लिए बार-बार जिला मुख्यालय या सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। शासन का यह प्रयास प्रशासनिक प्रक्रिया को सरल और मानवीय बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है।
इस अभियान में छत्तीसगढ़ सरकार की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है। राज्य सरकार ने सुशासन तिहार को केवल एक औपचारिक कार्यक्रम न रखकर जनसंपर्क और जनविश्वास के व्यापक अभियान के रूप में विकसित करने का प्रयास किया है। मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक और वरिष्ठ अधिकारियों ने विभिन्न जिलों, विकासखंडों और ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँचकर लोगों से प्रत्यक्ष संवाद किया। शासन की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, इसके लिए प्रशासनिक तंत्र को अधिक सक्रिय और जवाबदेह बनाने पर बल दिया गया।
छत्तीसगढ़ सरकार ने इस अभियान के माध्यम से राशन, पेंशन, प्रधानमंत्री आवास, किसान सहायता, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, पेयजल, सड़क तथा राजस्व संबंधी मामलों के त्वरित निराकरण पर विशेष ध्यान दिया। कई स्थानों पर शिविर लगाकर मौके पर ही आवेदन स्वीकार किए गए और समस्याओं के समाधान की प्रक्रिया शुरू की गई। इससे लोगों में यह विश्वास मजबूत हुआ कि सरकार उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुन रही है और उनके समाधान के लिए प्रतिबद्ध है। विशेष रूप से दूरस्थ आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में इस अभियान का सकारात्मक प्रभाव दिखाई देता है। लंबे समय से उपेक्षित क्षेत्रों में प्रशासन की प्रत्यक्ष उपस्थिति से लोगों के भीतर सहभागिता और विश्वास की भावना बढ़ी है। यह पहल केवल योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित नहीं रही, बल्कि शासन व्यवस्था में मानवीय संवेदना को भी स्थापित करने का प्रयास करती दिखाई दी।
सुशासन तिहार का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसके माध्यम से सरकार को योजनाओं की वास्तविक स्थिति का प्रत्यक्ष आकंलन करने का अवसर मिलता है। कई बार सरकारी रिपोर्ट और जमीनी वास्तविकता में अंतर दिखाई देता है। ऐसे में जनता से सीधा संवाद प्रशासनिक कमियों को समझने और सुधारने का अवसर प्रदान करता है। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति भी है। इसी सोच के साथ राज्य सरकार ने सुशासन एवं अभिसरण विभाग का गठन किया है तथा मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 की शुरुआत की है। सरकार का दावा है कि इसके माध्यम से प्रदेशवासी फोन, वेब पोर्टल, मोबाइल ऐप और लिखित आवेदन के जरिए अपनी समस्याएँ दर्ज करा सकेंगे तथा उनके समयबद्ध समाधान की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।
सुशासन तिहार के दौरान प्रदेश के सभी 33 जिलों में व्यापक स्तर पर अभियान संचालित किया गया। लगभग 11,693 ग्राम पंचायतों और शहरी क्षेत्रों में 1,286 समाधान शिविर आयोजित किए गए। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने स्वयं 12 स्थानों का निरीक्षण किया, 11 समीक्षा बैठकें लीं तथा 33 समाधान शिविरों में भागीदारी की। अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्र में पहुँचकर जनचौपाल लगाना और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की घोषणा करना इस अभियान की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जा सकता है।
सरकार के अनुसार अभियान के दौरान 6 लाख से अधिक आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें अधिकांश मांग संबंधी आवेदन थे, जबकि हजारों शिकायतें भी दर्ज की गईं। विभिन्न जिलों में सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली तथा आवास से जुड़े विकास कार्यों की घोषणाएँ की गईं। प्रधानमंत्री आवास योजना, पीएम सूर्यघर योजना तथा अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी विशेष जोर दिया गया। हालाँकि इन उपलब्धियों के बीच कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी उभरते हैं। यदि सुशासन तिहार के दौरान लाखों आवेदन और हजारों शिकायतें सामने आईं, तो इसका अर्थ क्या है? क्या यह जनता का सरकार पर विश्वास दर्शाता है कि लोग अपनी समस्याएँ लेकर सामने आए, या यह संकेत देता है कि नियमित प्रशासनिक व्यवस्था समय पर समस्याओं का समाधान करने में सफल नहीं हो पा रही थी? यह भी विचारणीय है कि यदि पंचायत, विकासखंड, तहसील और जिला स्तर पर शिकायतों का प्रभावी निराकरण पहले से हो रहा होता, तो क्या इतनी बड़ी संख्या में लोगों को विशेष अभियान का इंतजार करना पड़ता? इसी प्रकार यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि प्राप्त आवेदनों में से कितनों का वास्तविक और स्थायी समाधान हुआ तथा कितने मामलों का केवल कागजी निपटारा किया गया।
सुशासन तिहार की सफलता केवल आवेदन लेने या शिविर आयोजित करने से नहीं मापी जाएगी। इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि प्राप्त शिकायतों में से कितनों का गुणवत्तापूर्ण और स्थायी समाधान हुआ, कितनी समस्याएँ दोबारा सामने नहीं आईं और क्या प्रशासन ने इस अभियान से कोई स्थायी सुधारात्मक सीख ली। विभागवार प्राप्त और निराकृत आवेदनों का सार्वजनिक ऑडिट, स्वतंत्र सत्यापन और निराकरण की गुणवत्ता का मूल्यांकन भी आवश्यक है। दरअसल किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुशासन का अर्थ केवल विशेष अभियानों के दौरान सक्रिय होना नहीं, बल्कि वर्षभर जनता के प्रति जवाबदेह बने रहना है। यदि सुशासन तिहार के बाद भी अधिकारी-कर्मचारी नियमित रूप से जनता के बीच संवाद बनाए रखते हैं और समस्याओं का स्थानीय स्तर पर समाधान सुनिश्चित करते हैं, तभी इस पहल का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।
निस्संदेह सुशासन तिहार छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक उत्तरदायित्व और लोककल्याण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह अभियान जितना सरकार की उपलब्धियों का परिचायक है, उतना ही प्रशासनिक व्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों का दर्पण भी है। इसकी वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब अगले वर्ष ऐसे अभियानों में शिकायतों की संख्या कम हो और जनता को अपनी सामान्य समस्याओं के समाधान के लिए विशेष तिहार का इंतजार न करना पड़े।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है क्या अगले वर्ष भी जनता को अपनी समस्याएँ बताने के लिए सुशासन तिहार का इंतजार करना पड़ेगा, या फिर प्रशासन इतना संवेदनशील और सक्षम हो जाएगा कि समस्याएँ वहीं हल हो जाएँ जहाँ वे उत्पन्न होती हैं? यही प्रश्न इस अभियान की सफलता की असली कसौटी भी है।