मुंबई। ईरान-अमेरिका संघर्ष और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की भारी बिकवाली देखने को मिल रही है। फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार से लगभग 19 अरब डॉलर (करीब 1.78 लाख करोड़ रुपये) की पूंजी निकाल ली है। इस भारी बिकवाली के चलते निफ्टी अपने 52 हफ्तों के उच्चतम स्तर से 9 प्रतिशत से अधिक गिर चुका है।
एलारा सिक्योरिटीज के आंकड़ों के अनुसार, अन्य उभरते बाजारों में निवेश प्रवाह जारी रहने के बावजूद भारत में लगातार पांचवें हफ्ते बिकवाली का दौर बना रहा। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में डॉलर आधारित निवेशकों के लिए गणित बिगड़ गया है, जिसके कारण कभी पसंदीदा रहा भारतीय बाजार अब नो-गो जोन की श्रेणी में आता दिख रहा है।
विदेशी निवेशकों की इस घबराहट के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
अस्थिर कूटनीतिक माहौल और सीजफायर का भ्रम
ईरान और अमेरिका के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम को निवेशक केवल रणनीतिक मान रहे हैं। कूटनीतिक समाधान न होने और भविष्य में नाकाबंदी की आशंका के कारण वैश्विक फंड लंबी अवधि के निवेश से बच रहे हैं।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और मुद्रास्फीति का दबाव
ब्रेंट क्रूड का 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचना भारत के लिए बड़ी चिंता है। तेल की ऊंची कीमतें चालू खाता घाटे को बढ़ाती हैं और महंगाई को जन्म देती हैं, जिससे रिजर्व बैंक पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बढ़ जाता है।
घटता रिस्क प्रीमियम और कमजोर होता रुपया
अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड के 4.5 प्रतिशत की ओर बढ़ने और भारतीय रुपये के डॉलर के मुकाबले 95 के स्तर तक गिर जाने से निवेशकों का रिस्क प्रीमियम कम हो गया है। इससे भारतीय शेयरों में निवेश का आकर्षण घटा है।
अन्य उभरते बाजारों से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा
दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजार वर्तमान में विदेशी निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक हैं। वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत की आय वृद्धि के मामूली अनुमानों की तुलना में इन देशों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है।
कर प्रणाली में बदलाव और बढ़ती लागत
वर्ष 2024 के बजट में शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स में की गई बढ़ोतरी के साथ-साथ प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) में वृद्धि ने निवेशकों के लिए बाजार में प्रवेश और निकास की लागत बढ़ा दी है। वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों की तुलना में भारत का टैक्स ढांचा अब चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
डॉलर मूल्य में शून्य रिटर्न की स्थिति
वर्ष 2021 के अंत से अब तक डॉलर के संदर्भ में निफ्टी का रिटर्न लगभग शून्य रहा है। मुद्रा के मूल्य में गिरावट के कारण निवेशकों का कैपिटल गेन समाप्त हो गया है, जिससे वैश्विक फंड मैनेजरों के लिए दोबारा निवेश करना मुश्किल हो गया है।
कंपनियों की कमाई में गिरावट की आशंका
युद्ध के कारण सप्लाई चेन प्रभावित होने और इनपुट कॉस्ट बढ़ने से भारतीय कंपनियों, विशेषकर मैन्युफैक्चरिंग और एफएमसीजी क्षेत्र के मार्जिन पर बुरा असर पड़ने की आशंका है। विदेशी निवेशकों को डर है कि वित्त वर्ष 2027 के लिए अनुमानित दो अंकों की कमाई में वृद्धि घटकर एक अंक में रह सकती है।
