प्रभात दत्त झा
वैश्विक व्यापार जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें मुक्त व्यापार समझौते केवल आर्थिक लाभ के दस्तावेज़ नहीं रह गए हैं, बल्कि वे भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं और रणनीतिक भरोसे के संकेतक बनते जा रहे हैं। अमेरिका-चीन व्यापार तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बदली आपूर्ति श्रृंखलाएँ और संरक्षणवाद की बढ़ती प्रवृत्तियों के बीच भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता इसी बदलते वैश्विक परिदृश्य की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उभर रहा है। दोनों पक्षों द्वारा वार्ताओं में “अच्छी प्रगति” के दावे इस ओर संकेत करते हैं कि यह समझौता अब केवल संभावना नहीं, बल्कि एक ठोस दिशा की ओर बढ़ रहा है।
यूरोपीय संघ लंबे समय से भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है। वित्त वर्ष 2024–25 में भारत-ईयू द्विपक्षीय व्यापार 136.53 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया, जिसमें भारत का निर्यात 75.85 अरब डॉलर रहा। यह आँकड़ा अपने आप में दोनों अर्थव्यवस्थाओं की परस्पर निर्भरता को दर्शाता है। इसके बावजूद, किसी व्यापक एफटीए के अभाव में यह व्यापार कई संरचनात्मक और गैर-टैरिफ बाधाओं से जूझता रहा है। तकनीकी मानकों की असमानता, फाइटोसैनिटरी नियमों की जटिलता और प्रमाणन प्रक्रियाओं की कठोरता भारतीय निर्यातकों के लिए ईयू बाजार तक पहुँच को सीमित करती रही है। प्रस्तावित एफटीए इन बाधाओं को कम कर एक अधिक संतुलित और पारदर्शी व्यापार वातावरण बना सकता है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य भारत के लिए इस समझौते को और अधिक प्रासंगिक बनाता है। चीन पर वैश्विक निर्भरता को कम करने की यूरोपीय कोशिशें और रूस के साथ व्यापारिक अनिश्चितताएँ भारत को एक वैकल्पिक, स्थिर और भरोसेमंद साझेदार के रूप में सामने लाती हैं। भारत के लिए भी यह समझौता चीन और रूस जैसे देशों पर अत्यधिक निर्भरता घटाने का अवसर प्रदान करता है। इस दृष्टि से ईयू-भारत एफटीए केवल व्यापारिक विस्तार नहीं, बल्कि रणनीतिक संतुलन का साधन भी बन सकता है।
इस समझौते का सबसे प्रत्यक्ष लाभ भारतीय निर्यातकों को मिलने की संभावना है। टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं में कमी से भारतीय वस्तुएँ—विशेषकर फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल्स, इंजीनियरिंग उत्पाद और रसायन—यूरोपीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकेंगी। भारत का सेवा क्षेत्र, जो पहले ही वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति में है, इस समझौते से विशेष रूप से लाभान्वित हो सकता है। वर्ष 2023 में भारत-ईयू सेवा व्यापार लगभग 59.7 अरब डॉलर का रहा था। सेवाओं के उदारीकरण और पेशेवर योग्यताओं की पारस्परिक मान्यता से यह व्यापार और विस्तृत हो सकता है।
निवेश के दृष्टिकोण से भी यह समझौता महत्वपूर्ण है। एफटीए यूरोपीय कंपनियों को भारत में दीर्घकालिक निवेश के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। भारत को एक विनिर्माण और उत्पादन केंद्र के रूप में देखने की यूरोपीय प्रवृत्ति ‘मेक इन इंडिया’ पहल को नई ऊर्जा दे सकती है। इससे न केवल पूंजी प्रवाह बढ़ेगा, बल्कि उन्नत तकनीक, प्रबंधन कौशल और रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। विशेष रूप से नवीकरणीय ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, क्लीन टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग भारत की औद्योगिक क्षमता को नई दिशा दे सकता है।
हालाँकि, इन संभावनाओं के साथ कई गंभीर चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं। टैरिफ कटौती सबसे बड़ा विवादास्पद मुद्दा बना हुआ है। यूरोपीय संघ ऑटोमोबाइल, शराब, मांस और कुछ चिकित्सा उपकरणों पर भारत से भारी टैरिफ कटौती की अपेक्षा करता है, जबकि भारत में इन क्षेत्रों को संवेदनशील माना जाता है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र में 100 प्रतिशत से अधिक टैरिफ को लेकर भारतीय उद्योगों को आशंका है कि अचानक कटौती से घरेलू विनिर्माण पर गंभीर दबाव पड़ेगा और रोजगार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
बौद्धिक संपदा अधिकारों को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच संतुलन की तलाश जारी है। यूरोपीय संघ कड़े आईपीआर मानकों पर जोर देता है, जबकि भारत अपने फार्मास्यूटिकल उद्योग और सस्ती दवाओं की वैश्विक आपूर्ति की भूमिका को बनाए रखना चाहता है। इसी तरह, श्रम और पर्यावरण मानकों को व्यापार समझौते से जोड़ने पर भारत को यह चिंता है कि अत्यधिक कठोर प्रावधान विकासशील देशों के लिए नई व्यापार बाधाएँ खड़ी कर सकते हैं।
ईयू का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म भी भारत के लिए एक नई चुनौती है। यह तंत्र स्टील और एल्यूमिनियम जैसे कार्बन-गहन उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाकर भारतीय निर्यात को महँगा बना सकता है। यदि इसका संतुलित समाधान नहीं निकला, तो यह एफटीए के लाभों को सीमित कर सकता है।
इन तमाम पहलुओं को देखते हुए, ईयू-भारत मुक्त व्यापार समझौता अवसर और जोखिम दोनों को एक साथ लेकर चलता है। यह भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अधिक विश्वसनीय स्थान दिला सकता है, लेकिन इसके लिए घरेलू उद्योगों की सुरक्षा, श्रम-पर्यावरण संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिस तरह से वैश्विक व्यापार की धुरी धीरे-धीरे एशिया की ओर खिसक रही है, उसमें यह समझौता भारत की भूमिका को निर्णायक रूप से परिभाषित कर सकता है—बशर्ते शर्तें केवल बाजार-खोलने तक सीमित न हों, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के अनुरूप गढ़ी जाएँ।