घटती हरियाली और बढ़ती कंक्रीट संरचनाएं बढ़ा रही गर्मी

छत्तीसगढ़ में भीषण गर्मी का कहर

राजकुमार मल

भाटापारा- सूर्य चमक लगभग 12 से 13 घंटे। नमी महज 25 प्रतिशत। तापमान 40 से 44 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा। सूर्य की पराबैंगनी किरणें बेहद तीव्र। यही वजह है कि तीव्र गर्मी महसूस की जा रही है।

सामान्य से दो घंटे ज्यादा चमक रहा है सूर्य। ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में शहरी क्षेत्र इस चमक से ज्यादा गर्म इसलिए हो रहा है क्योंकि भूमि उपयोग में परिवर्तन तेजी से हो रहा है। घटती हरियाली और बढ़ती पक्की संरचनाएं तेजी से गर्मी के समय और दिन बढ़ा रहीं हैंं।


बड़ी वजह

छत्तीसगढ़ में अप्रैल, मई के महीने सबसे गर्म माने जाते हैं लेकिन यह पहला साल है, जब तापमान सामान्य से ज्यादा महसूस किया जा रहा है। अनुसंधान में जो बातें सामने आईं हैं, वह चिंता बढ़ाने वाली हैं। विकास के नाम पर वृक्षों की कटाई और ऐसी पक्की संरचनाओं के निर्माण को प्राथमिकता, जो तापमान बढ़ाते हैं। इसके अलावा पौधरोपण में ऐसी प्रजातियों के रोपण से दूरी बनाना जो सूखे दिनों में नमी बनाए रखतीं हैं।


भूमि उपयोग में परिवर्तन

सड़क, इमारत और औद्योगिकीकरण की वजह से भूमि का उपयोग बदला है। इसमें हो रही वृद्धि साल-दर- साल गर्मी को बढ़ा रही है। दूसरी बड़ी हानि घटते भूजल भंडार के रूप में सामने है। बचाव के उपाय हैं लेकिन अपनाने को लेकर शासकीय और निजी क्षेत्र जैसी अनदेखी कर रहे हैं उसने संकट को और भी बढ़ाया हुआ है क्योंकि नमी की मानक मात्रा समाप्त हो चुकी है।


कमी प्री- मानसून बारिश में

आमतौर पर अप्रैल, मई के महीने में प्री-मानसून बारिश और आंधी राहत देती हैं और मानसून की राह आसान करती है लेकिन बीते दो साल से प्री-मानसून बारिश की मात्रा कम होती देखी जा रही है। नया परिवर्तन यह भी कि इसमें विलंब होना देखा जा रहा है। इसने भी गर्मी को तेज बनाया हुआ है। हरित क्षेत्र के विस्तार जैसे विकल्प हैं लेकिन गंभीर नहीं हैं, हम और हमारा छत्तीसगढ़।

पौधरोपण है समाधान

मौजूदा तीव्र गर्मी की मुख्य वजह तेजी से घटती हरियाली और भूमि उपयोग में असंतुलित परिवर्तन है। समाधान के रूप में विकास कार्यों के साथ हरित क्षेत्र का समानांतर विस्तार जरूरी है। सूखा सहनशील, गहन छायादार एवं स्थानीय जलवायु अनुकूल वृक्ष प्रजातियों का बड़े पैमाने पर रोपण करना चाहिए। शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में ‘ग्रीन बेल्ट’ विकसित कर तापमान वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकता है। प्रत्येक विकास योजना में हरित संतुलन को अनिवार्य रूप से शामिल करना समय की मांग है। तभी हम भविष्य की अत्यधिक गर्मी और जल संकट से बचाव कर पाएंगे।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

प्री-मानसून वर्षा में गिरावट से कृषि संकट गहराया

प्री-मानसून बारिश की घटती मात्रा और समय में हो रही देरी कृषि क्षेत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इस परिवर्तन के कारण मिट्टी की नमी में असमानता बढ़ गई है, जिससे खरीफ फसलों की समय पर बुवाई प्रभावित हो रही है। इस अनिश्चितता से निपटने के लिए सूखा सहनशील फसल किस्मों को प्राथमिकता देनी चाहिए। खेतों में वर्षा जल संरक्षण तकनीकों को अपनाकर और गहरी जुताई जैसे उपायों से मिट्टी में नमी बनाए रखना जरूरी है। समय रहते मृदा स्वास्थ्य सुधार कार्यक्रम और स्थानीय मौसम आधारित कृषि योजनाओं को लागू करना ही भविष्य की जलवायु चुनौतियों का प्रभावी समाधान हो सकता है।

डॉ. एस.आर. पटेल, रिटायर्ड साइंटिस्ट (एग्रोनॉमी), इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर

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