भिलाई: डायबिटीज के मरीजों के पैरों में होने वाले जिद्दी घाव (डायबिटिक फुट) और लंबे समय तक न भरने वाले गंभीर जख्मों के इलाज में अब जल्द ही बड़ी सफलता मिल सकती है। छत्तीसगढ़ के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे प्राकृतिक पदार्थ की पहचान की है, जो फंगस और बैक्टीरिया द्वारा बनाई जाने वाली संक्रमण की मजबूत परत (बायोफिल्म) को जड़ से रोकने में सक्षम है। इस महत्वपूर्ण शोध को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की प्रतिष्ठित ‘जर्नल ऑफ एप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी’ में स्थान मिला है।
यह अभूतपूर्व शोध एनआईटी रायपुर, रूंगटा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी और पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय (रायपुर) के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है। वैज्ञानिकों ने ‘होमोवेनिलिक एसिड’ (एचवीए) नामक प्राकृतिक पदार्थ पर ध्यान केंद्रित किया, जो फंगस और बैक्टीरिया के संयुक्त संक्रमण को कमजोर कर देता है। इस संक्रमण को चिकित्सा विज्ञान में सबसे जटिल और लाइलाज माना जाता है, क्योंकि यह सामान्य दवाओं के असर को बेअसर कर देता है।
एनआईटी रायपुर की प्रयोगशाला में शुरुआती परीक्षण के बाद, रूंगटा यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फार्मास्युटिकल साइंसेज में चूहों पर इसका अगला ट्रायल किया गया। वैज्ञानिकों ने चूहों के संक्रमित घावों पर एचवीए आधारित जेल का प्रयोग किया, जिसके बेहद सकारात्मक परिणाम सामने आए। मात्र 14 दिनों के भीतर चूहों के घाव न सिर्फ तेजी से भरने लगे, बल्कि सूजन कम हुई और नई त्वचा बनने की प्रक्रिया भी साफ दिखाई दी। इसके बाद रायपुर मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों ने माइक्रोस्कोपिक जांच के जरिए इन सुरक्षित और प्रभावी परिणामों की अंतिम पुष्टि की।
इस शोध में रूंगटा यूनिवर्सिटी के फार्मेसी विभाग के प्रोफेसर डॉ. संजय गुप्ता, एनआईटी रायपुर की डॉ. प्रतिमा गुप्ता और डॉ. अनमोल कुलश्रेष्ठ की मुख्य भूमिका रही है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, चूहों पर सफल परीक्षण के बाद अब अगले चरण में इसका क्लिनिकल (मानव) ट्रायल किया जाएगा। यदि इंसानों पर भी इसके परिणाम ऐसे ही सकारात्मक रहे, तो भविष्य में डायबिटिक फुट और कैथेटर से होने वाले संक्रमण के लिए एक अचूक जेल या दवा बाजार में आ सकेगी, जिससे मरीजों को दर्दनाक सर्जरी और एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक इस्तेमाल से मुक्ति मिलेगी।