अनूप वर्मा (जनधारा न्यूज)
चारामा। National Highway (NH-30) पर घुटनों तक पानी भरने की गंभीर समस्या के पीछे अब एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। बीते सोमवार की शाम को एसडीएम (SDM), तहसीलदार और मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) सहित बड़ी संख्या में नगरवासी उक्त स्थल पर पहुंचे और प्रभावित क्षेत्र का संयुक्त निरीक्षण किया। अधिकारियों और नागरिकों के इस संयुक्त निरीक्षण के दौरान यह साफ तौर पर पाया गया कि हाईवे के किनारे बनी दशकों पुरानी सरकारी नाली पर कुछ रसूखदारों और व्यापारियों द्वारा अवैध कब्जा (अतिक्रमण) कर लिया गया है। इसी वजह से पानी की निकासी पूरी तरह ठप हो गई है और हर मामूली बारिश में नेशनल हाईवे तालाब बन रहा है।
अब इस गंभीर मुद्दे को लेकर व्यापारी, ग्रामीण और प्रशासन एक बेहद पेचीदा और त्रिकोणीय विवाद में फंस गए हैं।
व्यापारियों की दो टूक मांग: या तो हटे अतिक्रमण, या बाजू की जमीन का हो भुगतान
चारामा के आम नागरिकों और जलभराव से पीड़ित व्यापारियों का कहना है कि इस नरकीय स्थिति का स्थाई समाधान होना चाहिए। इसके लिए व्यापारियों ने प्रशासन के सामने दो स्पष्ट विकल्प रखे हैं:
आपसी सहमति और मुआवजा: जिन व्यापारियों ने नाली पर कब्जा किया है, वे बाजू की निजी जमीन के मालिकों को आपसी सहमति से जगह का भुगतान (मुआवजा) करें, ताकि वहां नई नाली बनाकर पानी का रास्ता साफ किया जा सके और किसी का नुकसान भी न हो।
कड़ी कार्रवाई: यदि ऐसा नहीं होता है, तो प्रशासन बिना किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत दबाव के तत्काल प्रभाव से नाली के ऊपर बने अवैध अतिक्रमण को बुलडोजर चलाकर ध्वस्त करे।
प्रशासन का ‘बीच का रास्ता’ और नया पेंच
किसी बड़े विवाद या किसी के आर्थिक नुकसान से बचने के लिए प्रशासन फिलहाल ‘अंदरूनी रास्ता’ निकालने की कोशिश में है। प्रशासनिक योजना यह है कि जमीन के भीतर ही भीतर बड़े पाइप डालकर हाईवे के पानी को सीधे पास के तालाब तक पहुंचा दिया जाए।
वर्तमान में तुरंत राहत देने के लिए प्रशासन ने हाईवे के पास की आबादी जमीन पर ‘मार्क’ (चिन्हांकन) भी कर दिया है, ताकि उसे खोदा जा सके और सड़क पर रुक रहे पानी की अस्थाई निकासी की जा सके। लेकिन प्रशासन की इस चाल से अब एक नया मोर्चा खुल गया है।
खेत और जमीन मालिकों ने खोला मोर्चा: “हमारे खेतों में क्यों जाए पानी?”
प्रशासन की इस अस्थायी खुदाई व्यवस्था का आजू-बाजू के जमीन और खेत मालिकों ने कड़ा विरोध शुरू कर दिया है। उनका साफ कहना है कि:
“जब हाईवे पर पहले से ही नाली स्वीकृत और निर्मित है, तो अतिक्रमणकारियों को बचाने के लिए प्रशासन हमारी जमीन क्यों खोद रहा है? अगर मिट्टी खोदकर पानी खुला छोड़ दिया जाएगा, तो यह गंदा पानी हमारे खेतों और जमीनों में भरेगा, जिससे हमारी संपत्ति और फसलें बर्बाद होंगी। प्रशासन को यह उलझाव बंद कर सीधे नाली से अतिक्रमण हटाना चाहिए।”
इस भारी विरोध के कारण फिलहाल प्रशासन धर्मसंकट में फंसा हुआ है कि आखिर क्या कदम उठाया जाए। हालांकि, निरीक्षण पर पहुंचे अधिकारियों का कहना है कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जल्द ही कोई अंतिम निर्णय लेकर एक्शन लिया जाएगा।
जनधारा न्यूज का बड़ा सवाल: जब अतिक्रमण हो रहा था, तब सोया था प्रशासनिक अमला?
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह उठता है कि जब हाईवे की इस मुख्य सरकारी नाली पर सालों से धीरे-धीरे कब्जा किया जा रहा था, तब नेशनल हाईवे अथॉरिटी (NHAI), राजस्व विभाग और स्थानीय नगरीय प्रशासन का अमला क्या कर रहा था?
क्या जिम्मेदार अधिकारी किसी बड़ी सांठगांठ के चलते आंखें मूंदे बैठे थे? आज स्थिति इतनी संवेदनशील हो चुकी है कि एक तरफ हाईवे डूब रहा है, दूसरी तरफ किसानों के खेतों पर खतरा मंडरा रहा है और तीसरी तरफ अतिक्रमणकारी सुरक्षित हैं। चारामा अंचल की जनता अब यह पूछ रही है कि इस घोर लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर गाज कब गिरेगी?