भीषण गर्मी में रेमेडियल क्लास के नाम पर शिक्षकों-बच्चों की परीक्षा
विशेष रिपोर्ट
रायपुर:बेमेतरा
छत्तीसगढ़ में इन दिनों सूरज की तपिश और नौतपा की भीषण गर्मी से आम जनजीवन बेहाल है। पारा 45 डिग्री के पार पहुंच रहा है। ऐसी स्थिति में राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के विरोधाभासी और एक-दूसरे को काटते आदेशों (Multi-Orders) ने शिक्षकों, पालकों और बच्चों को भारी मानसिक और शारीरिक तनाव में डाल दिया है। जमीनी हकीकत को समझे बिना जारी हो रहे इन ‘मल्टी-ऑर्डर्स’ ने शिक्षा विभाग की पूरी कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
आदेशों का टकराव: कैलेंडर कुछ, हकीकत कुछ
शिक्षा विभाग द्वारा जारी सिलसिलेवार आदेशों को देखें तो प्रशासनिक तालमेल की भारी कमी साफ नजर आती है:
20 अप्रैल: राज्य में लगातार बढ़ते तापमान और लू (Heat Wave) के खतरों को देखते हुए शासन ने बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर स्कूली बच्चों के लिए समय से पहले ग्रीष्मकालीन अवकाश की घोषणा कर दी।
30 अप्रैल तक: स्कूलों के कार्यालयीन और प्रशासनिक काम निपटाने के लिए केवल कार्यालय स्टाफ को 30 अप्रैल तक उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए।
1 मई से 15 जून: लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के स्पष्ट और आधिकारिक आदेश के तहत समस्त शिक्षण स्टाफ (शिक्षकों) के लिए 1 मई से 15 जून तक विधिवत ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित किया गया।
जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) का ‘लोकल’ यू-टर्न
मामला तब पेचीदा और विवादित हो गया जब वार्षिक परीक्षा के परिणाम सामने आए। कई जिलों में रिजल्ट उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। अब अपनी प्रशासनिक नाकामी को छिपाने और कागजों पर रिजल्ट सुधारने के लिए स्थानीय स्तर पर जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) ने DPI के मूल आदेश को ताक पर रख दिया।
स्थानीय व्यवस्था और रेमेडियल क्लास (Remedial Classes) के नाम पर नया फरमान जारी कर दिया गया कि फेल या कमजोर बच्चों की कक्षाएं इस भीषण नौतपा में भी लगाई जाएं। इसके लिए छुट्टी पर चल रहे शिक्षकों और तपती दुपहरी में बच्चों को दोबारा स्कूल बुलाने का दबाव बनाया जा रहा है।
खड़े हो रहे हैं ये 3 बड़े सवाल
DPI के राज्यस्तरीय आदेश से बड़ा जिला शिक्षा अधिकारी का फरमान?
जब राज्य शासन और DPI ने नीतिगत रूप से 15 जून तक शिक्षकों को अवकाश दे दिया है, तो क्या जिला स्तर के अधिकारी उस आदेश को ओवररूल (Overrule) कर नया आदेश जारी कर सकते हैं? इस ‘मल्टी-ऑर्डर’ संस्कृति से विभाग में भारी अराजकता की स्थिति है।
नौतपा की जानलेवा गर्मी में बच्चों की सुरक्षा का जिम्मेदार कौन?
20 अप्रैल को जिस गर्मी के कारण स्कूल बंद किए गए थे, मई के आखिरी हफ्ते (नौतपा) में वह गर्मी चार गुना बढ़ चुकी है। ऐसे में कमजोर बच्चों को दोपहर की धूप में स्कूल बुलाना उनके स्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है। यदि किसी बच्चे को लू लगती है या कोई अनहोनी होती है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
शिक्षकों के ग्रीष्मकालीन अवकाश (Earned Leave) का क्या?
नियमतः अवकाश के दिनों में काम लेने पर अर्जित अवकाश (EL) या अन्य प्रतिपूरक लाभ दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन स्थानीय आदेशों में इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। यह सीधे तौर पर शिक्षकों के अधिकारों का हनन है।
पालकों और शिक्षक संगठनों में भारी आक्रोश
इस पूरे मामले पर शिक्षक संगठनों और पालकों का गुस्सा फूट पड़ा है। पालकों का कहना है कि:
”जब सरकार ने खुद माना कि अप्रैल की गर्मी बच्चों के लिए खतरनाक है, तो मई-जून की इस जानलेवा धूप में बच्चों को स्कूल बुलाना समझ से परे है। क्या अधिकारियों के लिए बच्चों की जान से ज्यादा जरूरी कागजी आंकड़े सुधारना है?”
वहीं शिक्षक प्रतिनिधियों का आरोप है कि पूरे सत्र में गैर-शैक्षणिक कार्यों (चुनाव, सर्वे, वीआईपी ड्यूटी) में शिक्षकों को झोंक दिया जाता है, जिससे पढ़ाई प्रभावित होती है। और अब जब रिजल्ट कम आया है, तो ठीकरा शिक्षकों और बच्चों के सिर फोड़कर इस भीषण गर्मी में प्रताड़ित किया जा रहा है।
निष्कर्ष: समन्वय की सख्त जरूरत
शिक्षा विभाग के ये ‘मल्टी-ऑर्डर’ दर्शाते हैं कि शीर्ष नेतृत्व (DPI) और मैदानी अधिकारियों (DEO) के बीच संवादहीनता की गहरी खाई है। रिजल्ट सुधारना बेहद जरूरी है, लेकिन इसके लिए नौतपा की आग को चुनना पूरी तरह से संवेदनहीनता है। शासन को तुरंत हस्तक्षेप कर इन विरोधाभासी आदेशों पर रोक लगानी चाहिए और बच्चों की सुरक्षा के साथ-साथ शिक्षकों के अवकाश के अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित करना चाहिए।
छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग में ‘मल्टी-ऑर्डर’ का चक्रव्यूह: नौतपा की आग में सुलगते आदेश
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May