रायपुर। देश भर में आज त्याग, समर्पण और आस्था का पावन त्योहार ईद-उल-अजहा यानी बकरीद बेहद धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक, यह त्योहार हर साल जुल-हिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है। इस खास मौके पर मुस्लिम समुदाय के लोग सुबह मस्जिदों और ईदगाहों में नमाज अदा कर देश में अमन-चैन की दुआ मांग रहे हैं। इसके बाद अल्लाह की राह में जानवरों की कुर्बानी देने की रस्म निभाई जा रही है।
हजरत इब्राहिम के इम्तिहान से जुड़ी है कुर्बानी की परंपरा
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, बकरीद पर कुर्बानी देने की यह ऐतिहासिक परंपरा हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के दौर से जुड़ी हुई है। माना जाता है कि अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के सपने के माध्यम से उनकी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी मांगी थी। हजरत इब्राहिम को अपने बेटे हजरत इस्माइल से सबसे ज्यादा मोहब्बत थी। जब उन्होंने अल्लाह के इस हुक्म के बारे में अपने बेटे को बताया, तो महज 13-14 साल की उम्र के हजरत इस्माइल भी अल्लाह की रजा के लिए सहर्ष तैयार हो गए।
जब हजरत इब्राहिम अपने बेटे की कुर्बानी देने लगे, तो अल्लाह ने उनकी सच्ची श्रद्धा और अटूट विश्वास को देखकर हजरत इस्माइल की जगह एक दुम्बा (भेड़ की एक प्रजाति) रख दिया। इस तरह हजरत इस्माइल सुरक्षित रहे और उनकी जगह दुम्बा कुर्बान हो गया। तभी से अल्लाह के प्रति इस महान त्याग की याद में कुर्बानी की यह सुन्नत (परंपरा) शुरू हुई।
तीन दिनों तक क्यों चलती है यह रस्म?
ईद-उल-अजहा का जश्न और इसकी इबादत कुल 3 दिनों तक चलती है। इसी वजह से बकरीद के दिन को मिलाकर लगातार तीन दिनों तक कुर्बानी देने का सिलसिला जारी रहता है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि देश-दुनिया के तमाम मुसलमान और हज यात्रा पर गए हाजी बिना किसी जल्दबाजी या हड़बड़ी के अपनी इस महत्वपूर्ण इबादत को पूरी शिद्दत और सुकून के साथ मुकम्मल कर सकें।
गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का है नियम
बकरीद के त्योहार में समानता और इंसानियत का एक बड़ा संदेश छिपा है, जो इसके गोश्त के वितरण के नियमों से साफ झलकता है। इस्लामिक नियमों के मुताबिक, कुर्बानी के गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटना जरूरी होता है:
पहला हिस्सा: खुद के परिवार के इस्तेमाल के लिए रखा जाता है।
दूसरा हिस्सा: दोस्तों, रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के लोगों में बांटने के लिए होता है।
तीसरा हिस्सा: समाज के गरीब, बेसहारा और जरूरतमंद लोगों के लिए निकाला जाता है, ताकि त्योहार की खुशी में हर कोई शामिल हो सके।
जानवरों की उम्र को लेकर तय हैं कड़े मानक
इस पावन इबादत में शामिल किए जाने वाले जानवरों की उम्र को लेकर भी बेहद सख्त नियम बनाए गए हैं। नियमानुसार, केवल पूरी तरह स्वस्थ और तय उम्र सीमा पार कर चुके जानवरों की ही कुर्बानी दी जा सकती है:
बकरा या बकरी: उम्र कम से कम एक साल पूरी होनी चाहिए।
भेड़ या दुम्बा: उम्र कम से कम 6 महीने की होनी जरूरी है।
भैंस या बैल: उम्र कम से कम दो साल की होनी चाहिए।
ऊंट: उम्र कम से कम पांच साल की होनी अनिवार्य है।