जनधारा संवाददाता: अनूप वर्मा, चारमाचारमा: नगर पंचायत चारमा के मंडी प्रांगण में इन दिनों दो हाईमास्ट लाइटें स्थानीय राजनीति और प्रशासनिक लापरवाही का एक अनोखा उदाहरण बनकर खड़ी हैं।
एक ही जगह पर बेहद करीब लगी दो ऊंची स्ट्रीट लाइटें न सिर्फ लोगों के कौतूहल का विषय हैं, बल्कि यह सीधे तौर पर नियमों की धंज्जियां उड़ाने और सरकारी प्रभाव के दुरुपयोग की ओर इशारा कर रही हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से एक लाइट पिछले एक साल से बंद पड़ी है

और उसकी एक हेडलाइट भी चोरी हो चुकी है, लेकिन नगर पंचायत अब इस लाइट को अपना मानने से ही साफ इनकार कर रहा है।तत्कालीन सीएमओ दुलेश्वर दारो सारवा की कार्यप्रणाली पर भी बड़े सवालइस पूरे मामले में सबसे बड़ा और गंभीर प्रश्नचिह्न उस समय पदस्थ नगर पंचायत के सीएमओ दुलेश्वर सार्वा की कार्यप्रणाली पर भी खड़ा हो रहा है।
स्थानीय नागरिकों और जानकारों के बीच यह चर्चा का विषय है कि:अधिकारी की मौजूदगी में नियम विरुद्ध काम?: साल 2024 के दशहरा महोत्सव के दौरान जब इस लाइट का बड़े धूमधाम से लोकार्पण किया गया था, तब तत्कालीन सीएमओ दुलेश्वर सार्वा खुद वहां मौजूद थे। उनकी गरिमामयी उपस्थिति में ही यह पूरा आयोजन संपन्न हुआ था।मंच से दी गई थी नगर पंचायत की जानकारी: कार्यक्रम के दौरान मंच से जनप्रतिनिधियों द्वारा बकायदा भरे मन से जनता के सामने यह बात कही गई थी

कि यह हाईमास्ट लाइट नगर पंचायत के द्वारा (नगर पंचायत प्रदत्त) लगाई गई है
सीएमओ ने क्यों नहीं की आपत्ति?: अब सवाल यह उठता है कि यदि इस लाइट के लिए नगर पंचायत की तरफ से कोई टेंडर ही जारी नहीं हुआ था और न ही कोई प्रशासनिक स्वीकृति थी, तो तत्कालीन सीएमओ ने अपनी मौजूदगी में ऐसा कैसे होने दिया? एक जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते उन्होंने इस नियम विरुद्ध कार्य और मंच से की जा रही घोषणा पर तत्काल आपत्ति क्यों नहीं जताई?
क्या इस पूरे घालमेल में उनकी भी मूक सहमति या मिलीभगत थी? यह अपने आप में एक बड़ा प्रशासनिक जांच का विषय है।मंडी का अलग क्षेत्राधिकार, फिर नगर पंचायत की राशि से क्यों हुआ काम?मामले में क्षेत्राधिकार को लेकर भी तकनीकी सवाल उठ रहे हैं। मंडी क्षेत्र का अपना एक अलग दायरा और स्वतंत्र प्रशासन होता है

, जबकि नगर पंचायत का कार्यक्षेत्र अलग है। भले ही मंडी प्रांगण भौगोलिक रूप से नगर पंचायत क्षेत्र के बीच में स्थित हो, लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक रूप से दोनों अलग-अलग निकाय हैं।
ऐसे में सवाल वहीं का वहीं खड़ा है कि अगर तत्कालीन नगर पंचायत अध्यक्ष को जनहित या विकास का कोई कार्य करना ही था, तो उन्होंने नगर पंचायत के अपने वार्डों और अधिकार क्षेत्र की जमीनों को छोड़कर, बिना किसी टेंडर के दूसरे विभाग (मंडी बोर्ड) के परिसर में जाकर लाइट क्यों लगवाई?
अगल-बगल खड़ी दो लाइटें: एक नियम विरुद्ध, दूसरी नियमानुसारलोकार्पण के महज दो महीने बाद ही नगर पंचायत चुनाव हुए और तत्कालीन अध्यक्ष चुनाव हार गए। चुनाव के बाद जब नए अध्यक्ष और जनप्रतिनिधि चुनकर आए, तो उन्होंने शुरुआत में इस लाइट को नियम विरुद्ध बताते हुए यहां से हटाकर दूसरी जगह शिफ्ट करने की बात कही थी।
लेकिन आज डेढ़ साल (18 महीने) से अधिक का समय हो चुका है, और वह बंद पड़ी लाइट आज भी जस की तस खड़ी है।मामला तब और पेचीदा हो गया जब नए कार्यकाल में नगर पंचायत ने नियमानुसार नया टेंडर जारी कर उसी बंद पड़ी लाइट के ठीक बाजू में उससे भी ऊंची एक नई हाईमास्ट लाइट खड़ी कर दी। आज स्थिति यह है कि एक लाइट चालू है
और पूर्व अध्यक्ष के समय लगी पहली लाइट कबाड़ की तरह खड़ी सफेद हाथी साबित हो रही है।वर्तमान मुख्य नगरपालिका अधिकारी (सीएमओ) हेमंत कुमार नेताम से जब इस संबंध में जानकारी ली गई, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि “इस लाइट के लिए नगर पंचायत की तरफ से न तो कोई टेंडर निकाला गया था और न ही इसे लगाने की कोई प्रशासनिक अनुमति दी गई थी।
जिसके द्वारा यह लाइट लगाई गई, वही इसके बारे में जाने। नगर पंचायत द्वारा इसके लिए कोई भुगतान नहीं किया गया है।”जनता के मन में उठ रहे गंभीर सवालसीएमओ के इस बयान के बाद अब चारमा क्षेत्र की जनता के बीच कई गंभीर सवाल तैर रहे हैं:किस हैसियत से लगी लाइट?
: अगर नगर पंचायत ने टेंडर जारी नहीं किया और कोई भुगतान नहीं हुआ, तो तत्कालीन अध्यक्ष ने किस आधार पर दूसरे विभाग के सरकारी परिसर में इतनी बड़ी लाइट लगवा दी? क्या पद का दुरुपयोग कर ठेकेदार पर दबाव बनाकर इसे चुनाव जीतने के लिए आनन-फानन में खड़ा किया गया था?निजी पैसे से लगी तो बर्बादी क्यों?
यदि यह मान भी लिया जाए कि पूर्व अध्यक्ष ने अपने निजी खर्च से इसे लगवाया था, तो आज एक साल से यह बंद क्यों है? इसकी चोरी हुई हेडलाइट की सुध लेने वाला कोई क्यों नहीं है?भले ही नगर पंचायत आज इस लाइट से पल्ला झाड़ रही हो, लेकिन चुनाव से पहले तत्कालीन जनप्रतिनिधियों और तत्कालीन सीएमओ दुलेश्वर दारो सारवा की संदिग्ध भूमिका ने आज शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।