कल यानी 8 मार्च को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाएगी। यह दिन केवल औपचारिक उत्सव का नहीं, बल्कि उन रूढ़ियों को तोड़ने का प्रतीक बन गया है जिन्होंने सालों से महिलाओं के कार्यक्षेत्र को सीमित कर रखा था। आज भारत की महिलाएं केवल स्कूल, अस्पताल या बैंक जैसे पारंपरिक दफ्तरों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उन चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में अपना लोहा मनवा रही हैं जिन्हें कभी पूरी तरह ‘पुरुष प्रधान’ माना जाता था। झारखंड के घने जंगलों की खदानें हों, राजस्थान के तपते तेल के कुएं हों या पटरी पर दौड़ते विशाल रेल इंजन—हर जगह महिलाओं की मौजूदगी अब एक नई हकीकत है।
भारत के बड़े औद्योगिक समूह इस बदलाव के सबसे बड़े गवाह बन रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाले वेदांता ग्रुप ने इस दिशा में मिसाल कायम की है। ग्रुप के कुल कार्यबल में आज 23 फीसदी महिलाएं हैं, और कंपनी का लक्ष्य 2030 तक इस संख्या को बढ़ाकर 30 से 35 फीसदी करने का है। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि कार्यस्थल पर आई एक बड़ी क्रांति है। ओडिशा के झारसुगुडा में स्थित दुनिया के सबसे बड़े एल्युमिनियम स्मेल्टर प्लांट में आज 100 से अधिक महिलाएं पूरी तरह से ‘पॉटलाइन’ का संचालन कर रही हैं, जो सीधे तौर पर उत्पादन और लॉजिस्टिक्स जैसे जटिल कार्यों से जुड़ी हैं। इतना ही नहीं, देश की पहली ‘ऑल-वुमन लोकोमोटिव टीम’ भी इसी ग्रुप का हिस्सा है, जहां सात जांबाज महिलाएं भारी भरकम रेल इंजन दौड़ा रही हैं।
खदानों और भारी उद्योगों (हैवी इंडस्ट्री) में भी महिलाओं का बढ़ता प्रभाव स्पष्ट है। ‘हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड’ जैसी दिग्गज कंपनी में सैकड़ों महिलाएं इंजीनियरिंग, भू-विज्ञान और प्लांट ऑपरेशन जैसे तकनीकी पदों पर आसीन हैं। सिंदेसर खुर्द जैसी अत्याधुनिक और मशीनीकृत भूमिगत खदानों में वर्षा शर्मा जैसी महिलाएं हैवी अर्थ मूविंग मशीनरी का नेतृत्व कर रही हैं। इन महिलाओं का मानना है कि जब युवा पीढ़ी उन्हें इन दुर्गम क्षेत्रों में नेतृत्व करते देखती है, तो समाज की सोच और कल्पनाशक्ति का दायरा बढ़ता है।
तेल और गैस क्षेत्र में भी महिलाएं पीछे नहीं हैं। राजस्थान के मंगला प्रोसेसिंग टर्मिनल में साल 2019 से महिलाएं नाइट शिफ्ट में काम कर रही हैं, जहां 24 घंटे चलने वाले हाइड्रोकार्बन प्रोसेसिंग सिस्टम की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। यहाँ तक कि ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षित कर ‘दुर्गा वाहिनी’ जैसी सुरक्षा टीमें बनाई गई हैं, जो तेल क्षेत्रों की सुरक्षा में तैनात हैं। 2026 का यह महिला दिवस बताता है कि भारत की अर्थव्यवस्था के हर सेक्टर में महिलाएं अब एक अनिवार्य ताकत बन चुकी हैं, जो आसमान के साथ-साथ धरती की गहराइयों को भी फतह कर रही हैं।