छत्तीसगढ़ के इन गांवों में नहीं खेली जाती होली, रंग-गुलाल और होलिका दहन पर है रोक

कोरबा, 2 मार्च 2026। होली का नाम सुनते ही आमतौर पर रंग-गुलाल, पिचकारी और होलिका दहन की झलक सामने आती है, लेकिन छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के धमनागुड़ी और खरहरी गांवों में होली का नजारा बिल्कुल अलग है। यहां न तो होलिका दहन होता है और न ही रंग-गुलाल खेला जाता है। ग्रामीण बताते हैं कि यह परंपरा उनकी पूर्वजों की आस्था और मान्यताओं से जुड़ी हुई है।

अनहोनी के डर से नहीं मनाई जाती होली

धमनागुड़ी और खरहरी के लोग मानते हैं कि होली खेलने से अनहोनी या दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए वर्षों से यह परंपरा निभाई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि त्योहार का आनंद सिर्फ रंगों और उत्सव में ही नहीं, बल्कि शांति और श्रद्धा में भी मिलता है।

100 सालों से नहीं मनाई होली

धमनागुड़ी के निवासी गनपत सिंह कंवर के अनुसार, गांव में होली लगभग 100 वर्षों से नहीं मनाई जाती। उनके बचपन से ही यह परंपरा चल रही है। हालांकि पर्व का महत्व पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाया जाता है।

होली मनाने की कोशिश के बाद लगी आग

खरहरी निवासी तामेश्वर सिंह पैकरा ने बताया कि लगभग 9 साल पहले एक परिवार ने गांव में होली मनाने का प्रयास किया था। कुछ समय बाद ही उनके घर में अचानक आग लग गई। इस घटना के बाद से गांव में होली खेलने की परंपरा पूरी तरह बंद हो गई।

बाहर खेलकर लौटने वालों से पूछताछ

ग्रामीणों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति बाहर जाकर होली खेलकर लौटता है, तो गांव में प्रवेश से पहले उससे रंग-गुलाल खेलने के बारे में पूछताछ की जाती है। इसे गांव की सुरक्षा और चेतावनी की परंपरा से जोड़ा गया है।

धमनागुड़ी और खरहरी की यह अनूठी परंपरा दर्शाती है कि होली केवल रंग और उल्लास तक सीमित नहीं है, बल्कि आस्था, परंपरा और सामुदायिक विश्वास भी इसकी पहचान हैं। यही कारण है कि यह परंपरा आज भी कायम है और लोगों के लिए श्रद्धा का विषय बनी हुई है।

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