गरियाबंद। जिले के सुपेबेड़ा गांव में किडनी रोग से 133वीं मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग एक बार फिर सक्रिय हो गया है। लगभग दो साल के अंतराल के बाद एम्स के किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. विनय राठौर के नेतृत्व में गांव में दो दिवसीय विशेष स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया। हालांकि, विभाग द्वारा किए गए व्यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद 1400 की आबादी वाले इस गांव से महज सौ ग्रामीणों ने ही जांच में रुचि दिखाई।
जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. वी.के. नवरत्ने ने स्वयं शिविर की मॉनिटरिंग की। उन्होंने गांव का भ्रमण कर पीड़ितों और जनप्रतिनिधियों से मुलाकात की और ग्रामीणों से अधिक संख्या में पहुंचकर चिकित्सकीय लाभ लेने की अपील की।
शिविर के दौरान लगभग 40 ग्रामीणों के रक्त के नमूने लिए गए हैं, जिन्हें विस्तृत जांच के लिए एम्स की प्रयोगशाला भेजा जाएगा। विशेषज्ञों की टीम ने स्थानीय स्कूलों का भी दौरा किया और बच्चों में फ्लोरोसिस के लक्षणों की जांच कर रिपोर्ट तैयार की। बताया जा रहा है कि पूर्व में हुई जांचों में 90 प्रतिशत नमूनों की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के कारण ग्रामीणों में एक प्रकार का भय है, जिसके चलते वे चिकित्सकीय प्रक्रिया से कतरा रहे हैं। कई प्रभावित ग्रामीण अब भी ओडिशा के अस्पतालों या आयुर्वेदिक उपचार का सहारा ले रहे हैं।
सीएमएचओ ने जानकारी दी कि मार्च के दूसरे सप्ताह से ग्रामीणों के लिए टेली-मेडिसिन की सुविधा शुरू कर दी जाएगी। इस व्यवस्था के तहत सुपेबेड़ा और देवभोग अस्पताल के मरीज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सीधे एम्स के विशेषज्ञों से परामर्श ले सकेंगे। इसके अलावा एम्स के विशेषज्ञ महीने में एक दिन नियमित रूप से देवभोग अस्पताल में अपनी सेवाएं देंगे।
चिकित्सकीय दल के साथ संबलपुर यूनिवर्सिटी से मुख्यमंत्री रिसर्च फेलो की टीम भी सुपेबेड़ा पहुंची। संस्थान के प्रमुख प्रलय विश्वास के नेतृत्व में टीम ने गांव से जमीन के ऊपरी और भूजल के नमूने एकत्र किए हैं। साथ ही कृषि भूमि के मिट्टी के नमूने भी लिए गए हैं। इन नमूनों की जांच संबलपुर यूनिवर्सिटी की लेबोरेटरी ऑफ रेनल टॉक्सिको पैथोलॉजी में की जाएगी, जिससे पानी और मिट्टी में मौजूद हैवी मेटल्स का पता लगाया जा सके। इस पूरी जांच प्रक्रिया में करीब एक महीने का समय लगने की संभावना है।