बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रेलवे भूमि से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि बिना वैध और नवीनीकृत लीज के रेलवे की जमीन पर कब्जा रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने इस टिप्पणी के साथ दीपचंद कछवाहा द्वारा दायर रिट अपील को खारिज कर दिया है। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनाया।
मामले के अनुसार, अपीलकर्ता दीपचंद कछवाहा बिलासपुर रेलवे स्टेशन क्षेत्र स्थित अनंता होटल परिसर में व्यवसाय कर रहे थे। उन्होंने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे द्वारा की जा रही बेदखली की कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी थी। इससे पहले उनकी याचिका को एकल पीठ ने निस्तारित कर दिया था, जिसके खिलाफ उन्होंने यह रिट अपील दायर की थी। सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से बताया गया कि इसी तरह का एक मामला असलम हुसैन बनाम दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में पहले ही तय किया जा चुका है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कई प्रमुख टिप्पणियां कीं। हाई कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता के पास कोई वैध या पंजीकृत लीज मौजूद नहीं है। केवल किराया या टैक्स जमा करने मात्र से कोई कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं होता। लीज समाप्त होने और उसका नवीनीकरण न होने की स्थिति में संबंधित व्यक्ति को अनधिकृत कब्जेदार माना जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रेलवे भूमि का स्वामित्व केंद्र सरकार के पास है और रेलवे पर अवैध कब्जे हटाने का वैधानिक दायित्व है।
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में पूर्व के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा कि वर्तमान मामला भी पिछले फैसलों के समान ही है। रेलवे के वाणिज्यिक विभाग में पुनर्वास या वैकल्पिक दुकान देने की कोई नीति नहीं है। रेलवे स्टेशन के विस्तार और परिचालन संबंधी जरूरतों के लिए विभाग को लीज न बढ़ाने का पूरा अधिकार है। अदालत ने माना कि एकल पीठ के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है, इसलिए रिट अपील को खारिज कर दिया गया।