चिट्ठी, डाक और स्मृति : भारत और ऑस्ट्रेलिया


ऑस्ट्रेलिया से सुभाष मिश्र

भारत में चिट्ठी-पत्री केवल संवाद का माध्यम नहीं रही, वह जीवन की धड़कन थी। ख़त, पाती, पोस्टकार्ड और लिफ़ाफ़े के ज़रिये रिश्ते चलते थे, भावनाएँ सफऱ करती थीं और समय थम-सा जाता था। डाकिया किसी विभाग का कर्मचारी नहीं, घर का सदस्य जैसा होता था, जिसके आने से चेहरे खिल जाते थे या आँखें भर आती थीं। लेकिन तकनीक के तेज़ विस्तार ने इस परंपरा को लगभग हाशिये पर ढकेल दिया। आज चिट्ठी का मतलब रह गया है, कोर्ट का नोटिस, बैंक की सूचना या कोई सरकारी पत्र। शादी के कार्ड से लेकर शोक संदेश तक, सब कुछ व्हाट्सएप और ई-कार्ड में सिमट गया है। संवाद तेज़ हुआ है, पर संवेदनात्मक ठहराव ख़त्म हो गया है।


फिर भी स्मृति पूरी तरह नहीं मरी है। कुछ लोग आज भी पुरानी चिट्ठियांसहेजकर रखते हैं जैसे समय को तह करके अलमारी में रख दिया हो। बस्तर के जगदलपुर में रहने वाले मित्र विजय सिंह ने तो पुराने पत्रों को साझा करने के लिए एक व्हाट्सएप समूह ही बना रखा है। बीता हुआ समय वहाँ फिर बोलने लगता है। जब ऑस्ट्रेलिया में आकर मैंने देखा तो यही सोच और गहरी हो गयी। तकनीकी रूप से अत्यंत उन्नत देश होने के बावजूद, ऑस्ट्रेलिया में डाक व्यवस्था आज भी जीवन का सक्रिय हिस्सा है। मॉर्निंग वॉक के दौरान मुझे यह देखकर सुखद अचरज हुआ कि यहाँ हर घर के बाहर मेल बॉक्स लगे हैं। कोई लोहे का, कोई लकड़ी का, कोई रंगीन, कोई बिल्कुल सादा लेकिन हर घर के बाहर मेलबाक्स जरूर है। पोस्टमैन आज भी गाड़ी से उतरकर, तय समय पर, घर-घर चिट्ठियां डालता है। यह दृश्य साधारण लगता है, लेकिन उसके भीतर एक संस्कृति धड़कती है।
सिडनी की शांत गलियों में सुबह की सैर के दौरान जब हर घर के सामने सलीके से लगे मेल बॉक्स देखे तो लगा, यहाँ डाक केवल सूचना पहुँचाने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार का हिस्सा है।


भारत में डाक विभाग कभी सामाजिक ढाँचे की रीढ़ था। पोस्ट ऑफिस गाँव का केंद्र होता था, जहाँ मनीऑर्डर, बचत, बीमा और संवाद सब एक साथ चलते थे। लेकिन डिजिटल इंडिया के दौर में यह विभाग धीरे-धीरे औपचारिकता तक सिमट गया है। सेवाएँ मौजूद हैं, पर आम जीवन में उसकी दृश्य उपस्थिति कम होती चली गई है।
इसके विपरीत, ऑस्ट्रेलिया पोस्ट परंपरा और तकनीक के बीच संतुलन बनाकर चलता है। ई-गवर्नेंस और ऑनलाइन सेवाओं के बावजूद, हाथ से लिखी चिट्ठियों, कार्ड्स और पार्सल का चलन यहाँ जीवित है। जन्मदिन, क्रिसमस, धन्यवाद-पत्र , अब भी कागज़़ पर लिखे जाते हैं। यहाँ हैंडरिटन नोट को समय और सम्मान दोनों का प्रतीक माना जाता है। ऑस्ट्रेलिया पोस्ट की स्थापना 1809 में हुई थी। आज यह केवल डाक नहीं, बल्कि समुदायों को जोडऩे वाली संस्था है। बुज़ुर्गों के लिए पत्र, बच्चों के लिए कार्ड, स्थानीय व्यवसायों के लिए विश्वसनीय नेटवर्क। डाक व्यवस्था यहाँ जीवन की गति के साथ चलती है, उससे कटती नहीं। दिलचस्प यह है कि ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय परिवार भी इस संस्कृति से प्रभावित हो रहे हैं। उनके घरों के बाहर भी मेल बॉक्स हैं, और धीरे-धीरे वे भी कार्ड भेजने-पाने की आदत अपनाने लगे हैं। परंपरा अपने साथ लोगों को बहा ले जाती है। भारत ने सुविधा को प्राथमिकता दी, ऑस्ट्रेलिया ने संतुलन को। डिजिटल संदेश तुरंत पहुँचते हैं, लेकिन तुरंत खो भी जाते हैं। भारतीय डाक विभाग ने भारतीय लोगों के मन और उनकी संवेदनशीलता को समझने में चूक कर दी है। चिट्ठियाँ देर से पहुँचती थीं, लेकिन वर्षों साथ रहती थीं।
एक चिट्ठीपूरे परिवार को जोड़ती थी, जबकि आज का संदेश अक्सर निजी होकर भी अकेला होता है। शायद यही कारण है कि कोई भी माध्यम पूरी तरह समाप्त नहीं होता। रेडियो नहीं मरा, अख़बार नहीं मरा तो चिट्ठी भी पूरी तरह नहीं मरेगी। मैं ऑस्ट्रेलिया में रहते हुए अक्सर सोचता हूं, कागज पर लिखी हुई चिट्ठियों को हाथ में पड़कर पढऩे का आनंद कुछ और ही था। ऑस्ट्रेलिया की सूनी सड़कों पर चलते हुए मन चुपचाप यह सवाल पूछता है, अगर यही बात चिट्ठी में लिखनी होती, तो क्या शब्द वही होते?

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