-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ के चर्चित शराब घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल को मिली जमानत ने एक बार फिर उस सच्चाई को उघाड़ दिया है, जिसे सत्ता में बैठी सरकारें ढंकना चाहती हैं और जांच एजेंसियां टालना।
3200 करोड़ रुपये के कथित शराब घोटाले, 16 करोड़ 70 लाख रुपये की बरामदगी, रियल एस्टेट में काले धन की खपत और हजार करोड़ से अधिक की मनी हैंडलिंग के आरोप यह सब सुनने में इतने गंभीर हैं कि लगता है अब न्यायालय में अंतिम मुहर लग ही जाएगी, लेकिन अदालत के दरवाज़े पर पहुंचते ही पूरा नैरेटिव बदल जाता है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट कहता है किसी व्यक्ति को अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता। यहीं से असली सवाल खड़ा होता है।
अगर आरोप इतने बड़े हैं, तो केस अदालत में क्यों नहीं टिकता? अगर तंत्र इतना सक्षम है, तो सबूत इतने कमजोर क्यों पड़ जाते हैं? राजनीतिक गलियारों में यह कोई रहस्य नहीं कि जांच एजेंसियां सत्ता के इशारों पर काम करती हैं। विपक्ष यह आरोप लगाता है, सरकारें इनकार करती हैं। लेकिन अदालतों के आदेश बार-बार यह बता रहे हैं कि मामला सिर्फ राजनीतिक आरोपों का नहीं, बल्कि जांच की मंशा और तरीके का है। अगर किसी मंत्री, अधिकारी या राजनीतिक परिवार के खिलाफ केस बनाया जाता है, तो वह पहली बार में निर्णायक क्यों नहीं होता?
क्यों गिरफ्तारी पहले होती है, जांच बाद में? क्यों जमानत मिलते ही नया केस सामने आ जाता है? यह सिलसिला बताता है कि कई मामलों में जांच का मकसद अपराध सिद्ध करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को लगातार न्यायिक चक्कर में उलझाए रखना है। अदालत में केस खत्म हो जाए, इससे ज्यादा उपयोगी माना जाता है, उसे लटका कर रखना। यही वह बिंदु है जहां प्रक्रिया खुद सज़ा बन जाती है। यह बीमारी केवल केंद्र की एजेंसियों तक सीमित नहीं है। यह कहना आसान है कि ईडी और सीबीआई केंद्र सरकार के इशारे पर काम करती हैं। लेकिन जहां-जहां विपक्षी दल सत्ता में हैं, वहां राज्य की पुलिस, आर्थिक अपराध शाखाएं और विशेष जांच दल भी ठीक यही भूमिका निभाते दिखाई देते हैं।
कहीं एक राजनीतिक भाषण पर दर्जनों एफआईआर, कहीं आंदोलनकारियों पर गंभीर धाराएं, कहीं विरोधी नेताओं पर आर्थिक अपराधों की झड़ी। सरकार कोई भी हो, रंग कोई भी हो तंत्र का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार की तरह किया जाता है। केंद्र में हों तो ईडी-सीबीआई, राज्य में हों तो पुलिस और विशेष एजेंसियां। अगर यह तंत्र सच में मजबूत होता, तो अदालतों में तस्वीर कुछ और होती। सरकारी आंकड़े खुद स्वीकार करते हैं कि प्रवर्तन निदेशालय ने पिछले एक दशक में 5800 से अधिक मनी लॉन्ड्रिंग के मामले दर्ज किए, लेकिन कुल मामलों के मुकाबले सजा की दर एक प्रतिशत से भी कम है। 2019 के बाद दर्ज मामलों में भी 70 प्रतिशत से अधिक केस आज तक अदालतों में लंबित हैं।
सीबीआई का कनवेक्शन रेट अपेक्षाकृत बेहतर बताया जाता है, लेकिन उसके भी हजारों मामले 10-20 साल से अदालतों में अटके पड़े हैं। यह आंकड़े कानून की कमजोरी नहीं दिखाते, यह दिखाते हैं कि केस कैसे और क्यों बनाए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट बार-बार जांच एजेंसियों को याद दिला रहे हैं कि गिरफ्तारी जांच का औज़ार नहीं हो सकती, चार्जशीट की मोटाई सबूत नहीं होती और लंबी हिरासत संविधान की भावना के खिलाफ है। जब अदालतें बार-बार कहती हैं कि Process itself cannot become punishment, तो वह सिर्फ एक कानूनी टिप्पणी नहीं होती, वह पूरे तंत्र पर सवाल होता है। छत्तीसगढ़ आज इस तंत्र का सबसे साफ उदाहरण बन गया है।
शराब घोटाला, महादेव ऐप, डीएमएफ फंड, मनी लेंडिंग हर मामले में पैटर्न लगभग एक जैसा है। आरोप तेज़, गिरफ्तारी तुरंत, मीडिया ट्रायल पूरा और अदालत में पहुंचते ही केस कमजोर। यह स्थिति इसलिए खतरनाक है क्योंकि अगर न्यायालय न हों, अगर संवैधानिक संतुलन न हो, तो यही तंत्र जो आज सत्ता के इशारों पर केस बनाता है, किसी को भी वर्षों तक जेल में रख सकता है।
इतिहास गवाह है कि सत्ता जब तंत्र को अपने हाथ में ले लेती है, तो कानून सबसे पहले कमजोर पड़ता है। यही कारण है कि सवाल केवल छत्तीसगढ़ के शराब घोटाले का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जहां सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन एजेंसियां वही रहती हैं और केस फिर भी अदालत में नहीं टिकते।