चुनावी मोड में CG कांग्रेस, दिल्ली में 29 को बनेगी ये रणनीति

कृष्ण कुमार सिकंदर, रायपुर। नई दिल्ली में 29 जुलाई को होने वाली छत्तीसगढ़ कांग्रेस की समीक्षा बैठक सामान्य संगठनात्मक बैठक नहीं मानी जा सकती। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि बैठक की अध्यक्षता स्वयं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी करेंगे। इसमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत सहित प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी यह संकेत देती है कि कांग्रेस हाईकमान छत्तीसगढ़ को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य मान रहा है। विधानसभा चुनाव हारने के बाद और लोकसभा चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाने के बाद यह पहली ऐसी महत्वपूर्ण समीक्षा बैठकों में से एक है, जिसमें संगठन, विधानसभा की रणनीति और राजनीतिक दिशा तीनों पर एक साथ चर्चा होने की संभावना है।


बैठक ऐसे समय में हो रही है जब कांग्रेस विपक्ष की भूमिका को अधिक आक्रामक बनाने की कोशिश कर रही है। पिछले कुछ महीनों में पार्टी ने नकटी विस्थापन, कानून-व्यवस्था, किसानों की समस्याओं, बेरोजगारी, शिक्षा और प्रशासनिक मुद्दों पर लगातार सरकार को घेरने का प्रयास किया है। कांग्रेस का मानना है कि भाजपा सरकार के खिलाफ जन असंतोष को राजनीतिक मुद्दे में बदला जा सकता है, लेकिन केवल सरकार की आलोचना करना पर्याप्त नहीं होता। विपक्ष की विश्वसनीयता इस पर भी निर्भर करती है कि वह संगठनात्मक रूप से कितना सक्रिय और जनता के बीच कितना प्रभावी है, इसलिए यह बैठक केवल राजनीतिक मुद्दों की सूची बनाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि उन मुद्दों को जनता तक किस तरीके से पहुंचाया जाए।


बैठक का एक बड़ा निहितार्थ संगठनात्मक मजबूती से जुड़ा है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना रही है। सत्ता से बाहर आने के बाद किसी भी दल में संगठनात्मक शिथिलता आना स्वाभाविक माना जाता है। ऐसे में राहुल गांधी की मौजूदगी कार्यकर्ताओं और प्रदेश नेतृत्व दोनों के लिए एक स्पष्ट संदेश होगी कि हाईकमान राज्य संगठन पर लगातार नजर रखे हुए है। इससे संगठन में नई सक्रियता लाने का प्रयास भी दिखाई देता है।

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर समय-समय पर अलग-अलग चर्चाएं होती रही हैं। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जैसे वरिष्ठ नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक भूमिका है। ऐसे में दिल्ली की बैठक का एक उद्देश्य इन नेताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना भी हो सकता है। विपक्ष तभी प्रभावी बनता है, जब संगठन और विधायकों की रणनीति एक दिशा में काम करे। यदि नेतृत्व के स्तर पर कोई असहमति या अलग-अलग प्राथमिकताएं हों तो उसका असर सीधे संगठन पर पड़ता है। यह बैठक राजनीतिक संदेश के साथ-साथ आंतरिक समन्वय की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा सकती है।
विधानसभा का मानसून सत्र भी इस बैठक का एक प्रमुख कारण है। मानसून सत्र विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का सबसे प्रभावी मंच होता है। यदि कांग्रेस पहले से ही अपने मुद्दों, सवालों और रणनीति को स्पष्ट कर लेती है तो सदन में उसकी भूमिका अधिक प्रभावी हो सकती है। यह भी संभव है कि विभिन्न विभागों से जुड़े मुद्दों की जिम्मेदारी अलग-अलग नेताओं को सौंपी जाए और सदन के भीतर तथा बाहर एक समान राजनीतिक संदेश देने की रणनीति बनाई जाए।

बैठक का एक और महत्वपूर्ण पक्ष आगामी चुनावी तैयारियों से जुड़ा है। भले ही विधानसभा चुनाव अभी दूर हों, लेकिन स्थानीय निकाय, पंचायत और अन्य चुनाव लगातार राजनीतिक माहौल तैयार करते रहते हैं। कांग्रेस यदि अभी से संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की योजना बनाती है तो उसका लाभ भविष्य में मिल सकता है। पिछले चुनावों के अनुभव बताते हैं कि केवल बड़े नेताओं की सभाओं से चुनाव नहीं जीते जाते, बल्कि बूथ स्तर की सक्रियता निर्णायक भूमिका निभाती है, इसलिए जिला संगठनों की समीक्षा और उनकी सक्रियता पर चर्चा स्वाभाविक मानी जा रही है। राजनीतिक दृष्टि से यह बैठक भाजपा के लिए भी एक संकेत है। यदि कांग्रेस अपने संगठन को सक्रिय कर विपक्ष की भूमिका को अधिक आक्रामक बनाती है तो भाजपा सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर यदि बैठक केवल औपचारिक समीक्षा तक सीमित रह जाती है और उसके बाद जमीनी स्तर पर कोई बदलाव दिखाई नहीं देता, तो इसका राजनीतिक प्रभाव सीमित रहेगा। इसलिए बैठक की सफलता का वास्तविक आकलन उसके बाद दिखाई देने वाली गतिविधियों से होगा।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस पिछले कुछ समय से राहुल गांधी की राजनीति को राज्यों में अधिक सक्रिय रूप से स्थापित करने की कोशिश कर रही है। राज्यों के संगठनात्मक मामलों में उनकी सीधी भागीदारी बढ़ी है। छत्तीसगढ़ की बैठक इसी रणनीति का हिस्सा भी मानी जा सकती है। राहुल गांधी की अध्यक्षता यह दर्शाती है कि पार्टी राज्य स्तर के निर्णयों को केवल प्रदेश नेतृत्व पर नहीं छोड़ना चाहती, बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व स्वयं दिशा तय करना चाहता है। हालांकि बैठक के एजेंडे को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है, इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी बड़े संगठनात्मक बदलाव, नेतृत्व परिवर्तन या विशेष निर्णय पर चर्चा निश्चित रूप से होगी। लेकिन समीक्षा बैठकों में आमतौर पर संगठन की स्थिति, राजनीतिक अभियान, जन आंदोलनों की दिशा और भविष्य की रणनीति पर विचार किया जाता है। इसलिए इन विषयों पर चर्चा की संभावना स्वाभाविक है।


समग्र रूप से देखें तो दिल्ली की यह बैठक कांग्रेस के लिए केवल एक नियमित समीक्षा नहीं, बल्कि विपक्ष की नई राजनीतिक रणनीति तैयार करने का अवसर भी है। यह तय करेगी कि आने वाले महीनों में कांग्रेस केवल सरकार की आलोचना करने वाली पार्टी बनी रहती है या वह एक संगठित और आक्रामक विपक्ष के रूप में अपनी नई पहचान बनाने में सफल होती है। यदि बैठक के बाद संगठनात्मक सक्रियता बढ़ती है, जन आंदोलनों की गति तेज होती है और विधानसभा में कांग्रेस अधिक समन्वित भूमिका निभाती है, तो इसका सीधा राजनीतिक असर प्रदेश की राजनीति पर दिखाई दे सकता है। वहीं यदि ठोस कार्ययोजना और उसके क्रियान्वयन का अभाव रहा, तो यह बैठक भी अन्य संगठनात्मक बैठकों की तरह केवल औपचारिक समीक्षा बनकर रह जाएगी।

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