गिरजाघर और आश्रम के बीच खड़ा एक सवाल

सुभाष मिश्र

मैं इन दिनों छत्तीसगढ़ विकास संवाद की यात्रा पर हूं। विकास को केवल सरकारी आंकड़ों, सड़कों, पुलों और बड़ी-बड़ी योजनाओं में नहीं, बल्कि समाज के भीतर हो रहे बदलाव में भी तलाशने की कोशिश कर रहा हूं। इसी यात्रा में मैं जशपुर के कुनकुरी पहुंचा हूं। एक तरफ यहां का विशाल महागिरजाघर है, जो देश के प्रमुख और एशिया के बड़े चर्चों में गिना जाता है, और दूसरी तरफ इसी जशपुर की धरती पर वनवासी कल्याण आश्रम की वह धारा है, जिसने आदिवासी समाज के बीच अपनी एक अलग सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक जमीन तैयार की। मैं गिरजाघर को देख रहा हूं, उसकी यात्रा और उसके प्रभाव को समझने की कोशिश कर रहा हूं और वनवासी कल्याण आश्रम की गतिविधियों को भी देखने जा रहा हूं। इन दोनों के बीच खड़े होकर मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जशपुर और छत्तीसगढ़ में सेवा, शिक्षा, आस्था और धर्मांतरण की सीमाएं आखिर कहां मिलती हैं और कहां एक-दूसरे से टकराने लगती हैं?
इतिहास को अपनी सुविधा से आधा नहीं पढ़ा जा सकता। आज हम मिशनरियों और धर्मांतरण को लेकर जितने सवाल उठाते हैं, उतनी ही ईमानदारी से हमें उस दौर को भी देखना चाहिए जब जशपुर और सरगुजा के दूरस्थ आदिवासी इलाकों में न पर्याप्त स्कूल थे, न अस्पताल, न आवागमन के साधन और न शासन की वैसी पहुंच, जैसी आज दिखाई देती है। जंगलों और पहाड़ों के बीच बसे गांवों तक जब व्यवस्था नहीं पहुंची थी, तब मिशनरी संस्थाएं पहुंचीं। उन्होंने स्कूल खोले, छात्रावास बनाए, स्वास्थ्य सेवाएं दीं और शिक्षा का एक ऐसा ढांचा खड़ा किया जिससे आदिवासी समाज की अनेक पीढिय़ां पढ़-लिखकर आगे बढ़ीं।,इस योगदान को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि इसके साथ मिशनरी गतिविधियां भी जुड़ी थीं। यदि किसी संस्था ने शिक्षा दी है, किसी बीमार का उपचार किया है और किसी वंचित बच्चे को आगे बढऩे का अवसर दिया है, तो उस काम को स्वीकार करने में संकोच क्यों होना चाहिए? लेकिन यहीं कहानी समाप्त नहीं होती।
इसी सेवा और शिक्षा की यात्रा के समानांतर धर्मांतरण का प्रश्न भी खड़ा हुआ। जैसे-जैसे मिशनरी प्रभाव बढ़ा, वैसे-वैसे आदिवासी समाज के भीतर धार्मिक पहचान बदलने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे। यह प्रश्न केवल इतना नहीं था कि कोई व्यक्ति किस ईश्वर को मानता है। आदिवासी समाज में धर्म उसकी संस्कृति, प्रकृति, पूर्वजों, पर्वों, परंपराओं और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है, इसलिए धर्मांतरण का प्रश्न धीरे-धीरे सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न भी बन गया। जशपुर इसी वैचारिक संघर्ष की महत्वपूर्ण भूमि बना।
एक तरफ चर्च और मिशनरी संस्थाओं का विस्तार था, तो दूसरी तरफ वनवासी कल्याण आश्रम जैसी संस्थाओं ने आदिवासी समाज के बीच शिक्षा, सेवा और सांस्कृतिक चेतना के अपने कार्यक्रम खड़े किए। बाद के वर्षों में दिलीप सिंह जूदेव जैसे नेता धर्मांतरण के विरोध और तथाकथित ‘घर वापसीÓ अभियान का बड़ा चेहरा बने। वे उन लोगों को उनकी मूल धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा में वापस लाने की बात करते थे, जिन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था, इसलिए जशपुर को केवल चर्च के प्रभाव की कहानी के रूप में नहीं देखा जा सकता और न केवल धर्मांतरण के विरोध की भूमि के रूप में। यह दरअसल दो प्रभावशाली सामाजिक धाराओं की प्रयोगभूमि है। दिलचस्प बात यह है कि आज इसी जशपुर की मिट्टी से निकले आदिवासी नेता विष्णु देव साय छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हैं। उनके शासनकाल में राज्य ने धर्मांतरण के प्रश्न पर पहले से अधिक कठोर कानूनी रुख अपनाया है। नया धर्म-स्वातंत्र्य कानून बल, प्रलोभन, धोखे और अनुचित प्रभाव के जरिए कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन को गंभीर अपराध मानता है और अलग-अलग परिस्थितियों में कठोर दंड का प्रावधान करता है। आदिवासी और अन्य संरक्षित वर्गों से जुड़े मामलों में सजा और अधिक कठोर है और सामूहिक अवैध धर्मांतरण के मामलों के लिए भी अत्यंत कड़े प्रावधान किए गए हैं। कानून अपनी जगह है और कानून का पालन होना ही चाहिए। यदि कोई व्यक्ति गरीबी का लाभ उठाकर, बीमारी के इलाज का लालच देकर, आर्थिक सहायता के बदले या किसी प्रकार के दबाव और धोखे से किसी का धर्म बदलता है तो इसे धार्मिक स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसके साथ एक दूसरा सवाल भी उतनी ही ताकत से पूछा जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपनी चेतना, अपनी इच्छा और अपने विवेक से अपनी आस्था बदलना चाहता है, तो क्या समाज उसे यह स्वतंत्रता देगा? यही वह महीन रेखा है जिस पर आज छत्तीसगढ़ खड़ा है।
मैं पिछले कुछ समय से बस्तर में आदिवासी समाज के भीतर धार्मिक पहचान को लेकर पैदा हो रहे टकराव पर लगातार लिखता रहा हूं। कहीं अंतिम संस्कार को लेकर विवाद है, कहीं गांव में रहने के अधिकार को लेकर तनाव है और कहीं धर्म बदल चुके आदिवासियों तथा अपनी पारंपरिक आस्था में रहने वाले आदिवासियों के बीच सामाजिक दूरी बढ़ रही है। चिंता इस बात की है कि धर्म का प्रश्न कहीं आदिवासी समाज को भीतर से विभाजित करने का कारण न बन जाए। जशपुर पहुंचकर मुझे इस पूरे प्रश्न का दूसरा सिरा दिखाई देता है। यहां मिशनरी प्रभाव कोई आज की घटना नहीं है। इसकी जड़ें एक सदी से अधिक पुराने सामाजिक इतिहास में हैं। यहां चर्च केवल प्रार्थना का स्थान नहीं रहा; उसके आसपास शिक्षा और सामाजिक संस्थाओं का एक पूरा संसार विकसित हुआ। इसी के समानांतर वनवासी कल्याण आश्रम और दूसरे संगठनों ने भी सेवा, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बनाई और शायद यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है—सेवा का जवाब सेवा से क्यों नहीं दिया जाए? अगर मिशनरी संस्थाओं ने स्कूल खोले तो सरकार और समाज उससे बेहतर स्कूल खोलें। अगर उन्होंने अस्पताल बनाए तो हम उससे बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था आदिवासी गांवों तक पहुंचाएं। अगर उन्होंने छात्रावास बनाए तो हम अपने बच्चों के लिए बेहतर छात्रावास बनाएं। अगर किसी आदिवासी परिवार को सम्मान, शिक्षा और सुरक्षा की तलाश में किसी दूसरी संस्था के पास जाना पड़ा, तो सबसे पहले हमें यह पूछना चाहिए कि हमारी अपनी व्यवस्था में वह खाली जगह क्यों बनी? धर्मांतरण को केवल कानून से रोकने की कोशिश आसान रास्ता हो सकती है, लेकिन उसका स्थायी समाधान समाज के भीतर विश्वास पैदा करना है।
यह बात भी स्पष्ट होनी चाहिए कि सेवा किसी धर्म की बपौती नहीं है। चर्च सेवा कर सकता है, वनवासी कल्याण आश्रम सेवा कर सकता है, मंदिर और गुरुद्वारे सेवा कर सकते हैं और सरकार भी कर सकती है। असली सवाल यह है कि सेवा के पीछे मनुष्य केंद्र में है या उसकी धार्मिक पहचान बदलने का कोई उद्देश्य। और यही कसौटी सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
मैं आज कुनकुरी के इस विशाल गिरजाघर को देखता हूं तो मुझे केवल एक धार्मिक इमारत दिखाई नहीं देती। मुझे इसके पीछे उन पीढिय़ों की कहानी भी दिखाई देती है जिन्हें यहां से शिक्षा मिली। उन लोगों की कहानी भी, जिन्हें स्वास्थ्य सेवाएं मिलीं। इसके साथ उन सवालों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जो धर्मांतरण को लेकर पिछले कई दशकों से जशपुर की राजनीति और समाज में मौजूद हैं। जब मैं वनवासी कल्याण आश्रम की तरफ जाता हूं तो वहां भी केवल एक संगठन को नहीं, बल्कि उसी ऐतिहासिक चुनौती के जवाब में विकसित हुई एक दूसरी सामाजिक धारा को देखने की कोशिश करता हूं। मेरे लिए सवाल चर्च बनाम आश्रम का नहीं है। सवाल यह है कि इन दोनों के बीच आदिवासी कहां खड़ा है? उसकी जमीन कहां है? उसकी भाषा कहां है? उसके देवता, उसकी प्रकृति, उसके पर्व और उसकी परंपराएं कहां हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—उसका अपना निर्णय कहां है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम आदिवासी समाज को बचाने, सुधारने, शिक्षित करने या धर्म देने के नाम पर उसके ऊपर अपना-अपना दावा कर रहे हैं और उसकी अपनी आवाज सबसे पीछे छूटती जा रही है? छत्तीसगढ़ को आज इसी प्रश्न का उत्तर तलाशना है।
नक्सलवाद के लंबे दौर के बाद बस्तर एक नए सामाजिक संक्रमण से गुजर रहा है। यदि वहां बंदूक की आवाज कम होती है और उसकी जगह धर्म और पहचान का संघर्ष ले लेता है तो इसे शांति नहीं कहा जा सकता। जशपुर का इतिहास हमें इस संभावित भविष्य को समझने का अवसर देता है, इसलिए कुनकुरी में खड़े होकर मुझे लगता है कि हमें इतिहास के दोनों पन्ने एक साथ पढऩे होंगे। मिशनरियों की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के योगदान को स्वीकार करना होगा और धर्मांतरण से जुड़े आरोपों और आशंकाओं की निष्पक्ष जांच भी करनी होगी। वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों की सामाजिक भूमिका को समझना होगा और यह भी देखना होगा कि कहीं सांस्कृतिक संरक्षण की लड़ाई सामाजिक विभाजन में तो नहीं बदल रही।

सरकार को कानून लागू करना है, लेकिन समाज को संवाद बचाना है। कानून जबरन धर्मांतरण रोक सकता है, लेकिन कानून दिलों के बीच पैदा हुई दूरी नहीं मिटा सकता। जशपुर और बस्तर को आज सबसे अधिक आवश्यकता इसी संवाद की है। ऐसा संवाद जिसमें चर्च भी बैठे, वनवासी कल्याण आश्रम भी बैठे, आदिवासी समाज के पारंपरिक नेतृत्व की आवाज भी हो और सरकार भी अपनी भूमिका निभाए। मैं छत्तीसगढ़ विकास संवाद की इस यात्रा में कुनकुरी से शायद यही सवाल लेकर आगे बढ़ रहा हूं—क्या हम आदिवासी समाज को यह अधिकार देने के लिए तैयार हैं कि वह अपनी आस्था, अपनी संस्कृति और अपने भविष्य का रास्ता स्वयं तय करे? और क्या हमारी शिक्षा और हमारी सेवा इतनी निस्वार्थ हो सकती है कि उसके बदले हमें किसी से उसका धर्म, उसकी पहचान या उसकी निष्ठा न मांगनी पड़े?
कुनकुरी का गिरजाघर और जशपुर का वनवासी कल्याण आश्रम दो अलग-अलग छोर दिखाई दे सकते हैं। इन दोनों के बीच जो जमीन है, वह छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज की जमीन है। इस जमीन पर किसी एक विचार की जीत से अधिक जरूरी है कि यहां रहने वाले मनुष्य की जीत हो। सेवा हो—लेकिन सौदा न हो। आस्था हो—लेकिन दबाव न हो। कानून हो—लेकिन उसका दुरुपयोग न हो और संवाद हो—ताकि धर्म की लड़ाई में आदिवासी समाज स्वयं न हार जाए।
सबसे मजबूत पंक्ति और केंद्रीय विचार मुझे चर्च और आश्रम के बीच आदिवासी कहां खड़ा है? लगता है। इसे आपके छत्तीसगढ़ विकास संवाद की वीडियो श्रृंखला में भी केंद्रीय प्रश्न बनाया जा सकता है। कानून संबंधी अंश में 2026 के नए अधिनियम की मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखा है; राज्यपाल की मंजूरी और प्रकाशित अधिनियम के उपलब्ध पाठ से इसके कठोर दंड प्रावधानों की पुष्टि होती है।

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