पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर विवाद गहरा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने आज शुक्रवार को इस मामले में चुनाव आयोग, पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है। मामला स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी एसआईआर प्रक्रिया के दौरान हटाए गए लाखों वोटरों से जुड़ा है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता की मांग पर अधिकारियों से विस्तृत डेटा सार्वजनिक करने के लिए कहा है।
क्या है पूरा मामला
यह याचिका पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रसेनजीत बोस की ओर से दायर की गई थी। याचिका में मांग की गई है कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान हटाए गए वोटरों का विधानसभा क्षेत्र के अनुसार पूरा ब्योरा सामने रखा जाए। इसमें यह जानकारी भी मांगी गई है कि कुल कितने फॉर्म भरे गए, कितनों को स्वीकार किया गया और कितनों को खारिज किया गया। याचिकाकर्ता के वकील का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बनी कमेटियां और ट्रिब्यूनल ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, जिससे वोटरों को परेशानी हो रही है।
नागरिकता पर चुनाव आयोग को नसीहत
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की। बेंच ने साफ किया कि चुनाव आयोग का काम किसी की नागरिकता तय करना नहीं है। यदि किसी ट्रिब्यूनल को यह लगता है कि कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट के लिए योग्य नहीं है, तो आयोग को यह मामला केंद्रीय मंत्रालय के पास नागरिकता कानून के तहत जांच के लिए भेजना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के एक पुराने मामले का हवाला देते हुए आयोग को अपनी जिम्मेदारी याद दिलाई है। अब देखना यह है कि चुनाव आयोग इस पर अपना क्या पक्ष रखता है।
