भोपाल। मध्य प्रदेश में एक बड़ा इंजीनियरिंग कारनामा पूरा हो गया है। बरसों से चली आ रही एक पौराणिक कथा को अब आधुनिक तकनीक के जरिए हकीकत में बदल दिया गया है। नर्मदा नदी के पानी को सोन बेसिन तक पहुँचाने के लिए कटनी जिले के स्लीमनाबाद में विंध्य पर्वत की पहाड़ियों को काटकर 12 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंग तैयार की गई है।
नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अनुसार 14 जुलाई तक सुरंग बनाने वाली मशीनें अपने तय लक्ष्य तक पहुँच गई हैं। इसके साथ ही नर्मदा के जल को आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है। अब केवल मशीनों को बाहर निकालने का काम बचा है, जो अगले डेढ़ महीने में पूरा हो जाएगा। इसके बाद नहरों में नर्मदा का जल प्रवाहित किया जाएगा।
लोककथाओं में छिपा है मिलन का रहस्य
कहानियों में कहा जाता है कि मैकल पहाड़ियों से निकलने वाली नर्मदा और सोनभद्र का विवाह तय हुआ था। लेकिन एक गलतफहमी के कारण दोनों विपरीत दिशाओं में चले गए। नर्मदा पश्चिम की ओर मुड़ गईं और सोनभद्र पूर्व की ओर बहने लगे। इन दोनों के बीच विंध्य की ऊंची और चट्टानी पहाड़ियाँ एक दीवार की तरह खड़ी थीं। अब इंसानी मेहनत ने इन पहाड़ों को चीरकर वह रास्ता बना दिया है, जो सदियों पहले अधूरा रह गया था।
कैसे बनी यह सुरंग?
इस परियोजना की शुरुआत साल 2011 में हुई थी। पहाड़ों के बीच से रास्ता बनाने का काम बेहद चुनौतीपूर्ण था, जिसके लिए अमेरिका और जर्मनी से अत्याधुनिक मशीनें मंगाई गई थीं। सुरंग तक पहुँचने और मशीनों को बाहर निकालने के लिए 100 फीट गहरा सीमेंटेड कुआं तैयार किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि अब मशीनों को खोलकर उनके पुर्जे बाहर निकाले जाएंगे और सुरंग में बिछाई गई पटरियाँ हटाकर इसे जल के बहाव के लिए तैयार किया जाएगा।
इस प्रोजेक्ट के पूरा होने से अब नर्मदा का पानी उस क्षेत्र तक पहुँच सकेगा, जहाँ सालों से सिंचाई की कमी महसूस की जा रही थी। यह केवल एक सिंचाई परियोजना नहीं, बल्कि इतिहास और विज्ञान का एक अनूठा संगम है।
