बलूचिस्तान : एक घोषणा, कई सवाल

-सुभाष मिश्र

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक पत्र तेजी से वायरल हो रहा है। इसमें रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान के नाम से बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किए जाने का दावा किया गया है। पत्र में कहा गया है कि बलूच सेना ने लगभग 85 प्रतिशत क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है, नया राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान स्वीकार कर लिया गया है, नई मुद्रा जारी की जा रही है तथा स्वतंत्र प्रशासन काम कर रहा है। स्वाभाविक है कि इस तरह के दावों ने दक्षिण एशिया की राजनीति, पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सबसे पहला प्रश्न यही है कि क्या किसी घोषणा मात्र से कोई नया राष्ट्र अस्तित्व में आ जाता है? इसका उत्तर स्पष्ट है नहीं।

इतिहास बताता है कि किसी भी राष्ट्र का जन्म केवल भावनाओं या घोषणाओं से नहीं होता। उसके लिए प्रभावी शासन, स्थायी जनसंख्या, निश्चित सीमाएं, प्रशासनिक नियंत्रण और सबसे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय वैधता आवश्यक होती है। अंतरराष्ट्रीय कानून में भी यही सिद्धांत स्वीकार किया गया है। इसलिए सोशल मीडिया पर प्रसारित किसी पत्र को किसी नए देश के जन्म का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यदि वास्तव में बलूचिस्तान में नई सरकार प्रभावी रूप से काम कर रही होती, तो उसके स्पष्ट संकेत अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों, पड़ोसी देशों और संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक प्रतिक्रियाओं में दिखाई देते।

फिर भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्व कम नहीं है। उसने एक बार फिर दुनिया का ध्यान उस बलूच प्रश्न की ओर खींचा है, जो सात दशकों से पाकिस्तान की सबसे जटिल राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों में से एक बना हुआ है। बलूचिस्तान क्षेत्रफल की दृष्टि से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन आबादी अपेक्षाकृत कम है। विडंबना यह है कि प्राकृतिक गैस, तांबा, सोना, कोयला और अन्य बहुमूल्य खनिजों से समृद्ध यह इलाका आज भी पाकिस्तान के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है। अरब सागर पर स्थित ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपेक) ने इसकी सामरिक महत्ता कई गुना बढ़ा दी है। यही कारण है कि बलूचिस्तान अब केवल पाकिस्तान का आंतरिक मामला नहीं रह गया, बल्कि चीन, ईरान, अफगानिस्तान और पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की रणनीतिक गणना का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
बलूच राष्ट्रवाद की जड़ें पाकिस्तान बनने के समय तक जाती है।

अनेक बलूच समूहों का आरोप है कि तत्कालीन कलात रियासत का पाकिस्तान में विलय उनकी इच्छा के विरुद्ध कराया गया था। इसके बाद समय-समय पर विद्रोह होते रहे। पिछले दो दशकों में बलोच लिबरेशन आर्मी, बलोच लिबरेशन फ्रंट और फ्री बलोचिस्तान मूवमेंट जैसे संगठन पाकिस्तान की सेना और सरकारी प्रतिष्ठानों के खिलाफ सक्रिय रहे हैं। हाल ही में कुछ बलूच नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र से शांति सेना भेजने और भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय से स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की अपील भी की है लेकिन अपील और मान्यता के बीच लंबा राजनीतिक तथा कानूनी रास्ता होता है।
बलूच संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तान ने दशकों से इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तो किया, लेकिन स्थानीय जनता को उसका न्यायसंगत लाभ नहीं मिला। दूसरी ओर अनेक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी बलूचिस्तान में जबरन गायब किए जाने, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, फर्जी मुठभेड़ों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश जैसे मामलों पर चिंता व्यक्त की है। पाकिस्तान इन आरोपों को खारिज करते हुए कहता है कि उसकी कार्रवाई आतंकवाद और अलगाववाद के विरुद्ध है तथा बाहरी शक्तियां विद्रोह को हवा दे रही हैं। सच चाहे जो भी हो, इतना स्पष्ट है कि बलूचिस्तान का संकट केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है। यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संसाधनों में हिस्सेदारी, सांस्कृतिक पहचान और संघीय ढांचे में विश्वास का भी प्रश्न है। दुनिया का अनुभव बताता है कि जहां राजनीतिक संवाद कमजोर पड़ता है, वहां असंतोष अंतत: सुरक्षा संकट का रूप ले लेता है।

बलूचिस्तान की स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि यहां चीन के हजारों करोड़ डॉलर के निवेश जुड़े हुए हैं। ग्वादर बंदरगाह और सीपेक को चीन अपनी वैश्विक ‘बेल्ट एंड रोड रणनीति का महत्वपूर्ण आधार मानता है। यही कारण है कि बलूच उग्रवादी संगठनों द्वारा चीनी परियोजनाओं और नागरिकों पर किए गए हमलों ने बीजिंग की चिंता भी बढ़ाई है। यदि इस क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो उसका प्रभाव केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चीन, अफगानिस्तान, ईरान और पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर पड़ेगा।

भारत के संदर्भ में भी यह विषय समय-समय पर चर्चा में आता रहा है। लंबे समय तक भारत का आधिकारिक रुख यही रहा कि बलूचिस्तान पाकिस्तान का आंतरिक मामला है। लेकिन 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में बलूचिस्तान के लोगों का उल्लेख कर वहां मानवाधिकारों का मुद्दा उठाया। इसके बाद भारत ने विभिन्न वैश्विक मंचों पर बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन पर चिंता व्यक्त की है। हालांकि, भारत ने कभी भी बलूचिस्तान की स्वतंत्रता का औपचारिक समर्थन नहीं किया। भारत के लिए यह संतुलन आवश्यक भी है, क्योंकि जिस प्रकार वह पाकिस्तान द्वारा कश्मीर के अंतरराष्ट्रीयकरण का विरोध करता है, उसी प्रकार उसे अपनी कूटनीतिक विश्वसनीयता भी बनाए रखनी होती है।
यहीं से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है कि यदि भविष्य में बलूचिस्तान स्वयं को स्वतंत्र घोषित भी कर दे, तो क्या वह संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बन जाएगा? उत्तर फिर वही है—इतना आसान नहीं। किसी नए राष्ट्र की सदस्यता के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुशंसा आवश्यक होती है। परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से किसी एक का भी वीटो पूरे प्रस्ताव को रोक सकता है। चीन के पाकिस्तान, विशेष रूप से ग्वादर बंदरगाह और सीपेक में गहरे आर्थिक एवं रणनीतिक हित हैं। इसलिए यह मानना कठिन नहीं कि वह बलूचिस्तान की स्वतंत्रता से जुड़े किसी प्रस्ताव का समर्थन करेगा। यही कारण है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में बलूचिस्तान की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा अवरोध केवल पाकिस्तान की सेना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन है।

एक और महत्वपूर्ण पक्ष सूचना युद्ध का है। आज सोशल मीडिया किसी भी संघर्ष का नया रणक्षेत्र बन चुका है। तस्वीरें, वीडियो और दस्तावेज कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाते हैं। इनमें कई वास्तविक होते हैं, लेकिन अनेक बार वे आधे सच, अतिशयोक्ति या सुनियोजित दुष्प्रचार का हिस्सा भी होते हैं। इसलिए किसी भी वायरल दस्तावेज को अंतिम सत्य मान लेना पत्रकारिता और बौद्धिक ईमानदारी दोनों के विरुद्ध है। बलूचिस्तान का प्रश्न केवल पाकिस्तान की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए एक सबक भी है कि किसी भी बहुजातीय राष्ट्र में केवल सैन्य शक्ति के सहारे स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती। जब स्थानीय समाज स्वयं को राजनीतिक रूप से उपेक्षित महसूस करता है, संसाधनों में हिस्सेदारी नहीं मिलती और लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ जाता है, तब असंतोष धीरे-धीरे विद्रोह का रूप ले लेता है। वहीं हिंसक अलगाववाद भी अंतत: सबसे अधिक नुकसान आम नागरिकों को ही पहुंचाता है।

दक्षिण एशिया के लिए भी यह एक चेतावनी है। यदि क्षेत्रीय असंतोषों का समाधान राजनीतिक संवाद, संवैधानिक अधिकारों और न्यायपूर्ण विकास से नहीं निकाला गया, तो वे समय-समय पर नए संकटों के रूप में सामने आते रहेंगे। इतिहास गवाह है कि असंतोष को दबाया जा सकता है, समाप्त नहीं किया जा सकता।

बलूचिस्तान की कथित स्वतंत्रता की घोषणा वास्तविक राजनीतिक परिवर्तन का संकेत है या केवल मनोवैज्ञानिक और प्रचारात्मक अभियान—यह समय बताएगा। लेकिन इतना निश्चित है कि इसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि बलूच प्रश्न अभी समाप्त नहीं हुआ है। पाकिस्तान के लिए यह केवल सुरक्षा अभियान का विषय नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास बहाली की चुनौती है। वहीं भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी यह अवसर है कि वे इस पूरे घटनाक्रम को भावनाओं या प्रचार के बजाय तथ्यों, अंतरराष्ट्रीय कानून और क्षेत्रीय स्थिरता के व्यापक संदर्भ में देखें। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना के आकार में नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के विश्वास, समान अधिकारों और न्यायपूर्ण भागीदारी में निहित होती है। बलूचिस्तान का प्रश्न अंतत: हमें इसी मूल सत्य की याद दिलाता है।

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