फ्लाइट में हुई एक अनजान मुलाकात, और बन गई भारत की पहली महाशक्ति!

नई दिल्ली। भारत आज रक्षा के क्षेत्र में दुनिया भर में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। वर्तमान में देश में 16 सरकारी रक्षा उपक्रम और 400 से अधिक निजी कंपनियाँ सक्रिय हैं, जिनके पास हथियार और सैन्य साजो-सामान बनाने के कानूनी अधिकार हैं। इसके अलावा हजारों छोटे कारखाने भी सेना के लिए कल-पुर्जे तैयार करते हैं। मगर क्या आप जानते हैं कि हमारे देश की सबसे पहली रक्षा कंपनी कौन-सी है और इसकी शुरुआत कैसे हुई थी? इस कंपनी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।

एक हवाई सफर के दौरान तय हुआ था कंपनी का भविष्य

इस ऐतिहासिक सफर की शुरुआत साल 1939 में एक लंबी दूरी की हवाई यात्रा के दौरान हुई थी। देश के मशहूर उद्योगपति सेठ वालचंद हीराचंद की मुलाकात विमान बनाने वाली एक विदेशी कंपनी के निदेशक विलियम डगलस पॉली से हुई। इस अचानक हुई बातचीत ने भारत में विमान निर्माण की नींव रखने का रास्ता साफ कर दिया। नतीजतन, 23 दिसंबर 1940 को बेंगलुरु में हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड की स्थापना की गई, जिसे आज हम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल के नाम से जानते हैं।

जब दूसरी रियासतें पीछे हटीं, तब एक राजा ने दिखाई दरियादिली

जब इस कंपनी को शुरू करने की योजना बनाई जा रही थी, तब मैसूर के शाही परिवार के महाराजा जयाचामाराजेंद्र वाडियार नए-नए गद्दी पर बैठे थे। जैसे ही उन्हें इस बेहतरीन योजना के बारे में पता चला, उन्होंने बिना देर किए 700 एकड़ की कीमती जमीन इस काम के लिए दे दी। इतना ही नहीं, उन्होंने इस कंपनी में 25 लाख रुपये का बड़ा निवेश भी किया। उस दौर में जब दूसरी बड़ी रियासतों ने इस विचार को खारिज कर दिया था, तब मैसूर के दीवान सर मिर्जा इस्माइल ने भी इस ऐतिहासिक पहल का पूरा समर्थन किया।

सरकार के हाथों में कैसे आई कंपनी की कमान?

शुरुआती दौर में यह कंपनी मैसूर सरकार और उद्योगपति की भागीदारी से चल रही थी। इसके बाद मार्च 1941 में भारत सरकार इसमें हिस्सेदार बनी और साल 1942 में इसका पूरा प्रबंधन अपने नियंत्रण में ले लिया। अमेरिका की एक बड़ी कंपनी के साथ मिलकर यहाँ सबसे पहले प्रशिक्षण विमान और लड़ाकू विमान बनाने का काम शुरू हुआ। इसके बाद जनवरी 1951 में इस पूरी कंपनी को आधिकारिक तौर पर भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन कर दिया गया।

अंतरिक्ष मिशन में भी दे रही है अपना बड़ा योगदान

आज के समय में यह सरकारी महारत्न कंपनी न केवल सेना के लिए लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर बनाती है, बल्कि देश के अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। साल 1988 में इसके लिए एक अलग एयरोस्पेस विभाग का गठन किया गया था। यह विभाग भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के रॉकेट और उपग्रहों के लिए जरूरी ढांचे तैयार करता है। यही कारण है कि भारतीय विमान निर्माण का गौरवशाली इतिहास आज पूरी दुनिया में देश का मान बढ़ा रहा है।

आज कितनी बड़ी है यह कंपनी और कौन है मालिक?

अगर इसके मालिकाना हक की बात करें तो आज यह पूरी तरह से भारत सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी है। शेयर बाजार में इस सरकारी कंपनी की कुल बाजार कीमत यानी मार्केट कैपिटल लगभग 3.01 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। साल 2018 में इसकी लिस्टिंग शेयर बाजार में हुई थी और वर्तमान में इसके एक शेयर की कीमत 4500 रुपये से ऊपर चल रही है।

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