बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगाने से पहले राज्य सूचना आयोग को अलग से नोटिस जारी करना होगा। साथ ही अधिकारी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर देना भी अनिवार्य है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपील की सुनवाई के दौरान जारी नोटिस को अंतिम नोटिस मानकर सीधे जुर्माना नहीं लगाया जा सकता। ऐसा करना कानून के अनुरूप नहीं है।
क्या है पूरा मामला
मामला कौशल विकास योजना के तहत खरीदी गई अनुपयोगी सामग्री की नीलामी और निस्तारण से जुड़ी जानकारी का है। एक आवेदक ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगी थी।
लोक सूचना अधिकारी ने जवाब दिया कि मांगी गई जानकारी बहुत विस्तृत है और पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं है। इसके बाद प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने 15 दिन के भीतर निशुल्क सूचना देने का आदेश दिया।
हालांकि, आवेदक ने बाद में राज्य सूचना आयोग में दूसरी अपील दायर कर दी। आयोग ने सुनवाई के बाद लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगाया। साथ ही विभागीय कार्रवाई की भी सिफारिश कर दी।
हाईकोर्ट में क्या दलील दी गई
याचिकाकर्ता ने अदालत में कहा कि जुर्माना लगाने से पहले धारा 20(1) के तहत अलग नोटिस जारी नहीं किया गया। आयोग ने दूसरी अपील के दौरान दिए गए नोटिस को ही अंतिम नोटिस मान लिया। जबकि कानून इसकी अनुमति नहीं देता। दूसरी ओर, राज्य सूचना आयोग ने कहा कि अपील की सुनवाई के दौरान नोटिस दिया जा चुका था। इसलिए अलग नोटिस की जरूरत नहीं थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने कहा कि आरटीआई अधिनियम की धारा 20(1) स्पष्ट है। इस प्रावधान के तहत जुर्माना लगाने से पहले संबंधित अधिकारी को अलग से कारण बताओ नोटिस देना जरूरी है। अदालत ने कहा कि यदि किसी कानून में विशेष प्रक्रिया तय की गई है, तो उसका पूरी तरह पालन करना अनिवार्य है।
अपील का नोटिस और जुर्माने का नोटिस अलग
हाईकोर्ट ने कहा कि अपील की सुनवाई के लिए जारी नोटिस और जुर्माना लगाने से पहले दिया जाने वाला नोटिस अलग-अलग प्रक्रिया का हिस्सा हैं। दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने 6 सितंबर 2022 को छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग द्वारा जारी जुर्माने के आदेश को रद्द कर दिया।