मजबूरी में हुआ था इस शाही स्वाद का जन्म, आज बड़े होटलों में भी हो रही है डिमांड

नई दिल्ली। अगर आपसे पूछा जाए कि भारत की सबसे कम आंकी जाने वाली लेकिन सबसे शानदार डिश कौन सी है, तो शायद आप सोच में पड़ जाएंगे। वाराणसी के एक बड़े शेफ रविकांत पाठक मानते हैं कि यह डिश कोई और नहीं बल्कि कढ़ी है। इसे समझने के लिए आपको रेस्टोरेंट में मिलने वाले तेल और मसालों से भरे खाने को भूलना होगा। भारत के घरों में बनने वाली असली कढ़ी बहुत अलग होती है। यह किसी राजा के आदेश से नहीं बल्कि भारतीय महिलाओं की समझदारी और बचत करने की आदत से बनी है।

अभाव से निकला स्वाद का खजाना

कढ़ी का इतिहास इस बात पर टिका है कि रसोई में कुछ भी बर्बाद न हो। पुराने समय में जब फ्रिज नहीं होते थे, तो दूध खट्टा हो जाता था। तब महिलाओं ने उस खट्टे दूध या दही को बेसन के साथ मिलाकर एक शानदार रसेदार डिश बना दी। यह हमें सिखाती है कि सादगी ही सबसे बड़ा हुनर है। यह सिर्फ पेट नहीं भरती बल्कि उस भारत की कहानी बताती है जिसने कमियों के बीच भी दुनिया के सबसे अच्छे स्वाद को जन्म दिया। इसकी शुरुआत राजस्थान और गुजरात के उन सूखे इलाकों से हुई जहां पानी और हरी सब्जियों की भारी कमी थी।

मजबूरी में बना जीवन का सहारा

जब जमीन से कुछ नहीं उगता था, तब जानवरों से मिले दूध का दही और बेसन ही लोगों का सहारा बना। मारवाड़ी कढ़ी में लहसुन और सूखी लाल मिर्च का तड़का दरअसल उसी बंजर जमीन की ताकत को दिखाता है। आज यह कढ़ी देश के हर घर की पहली पसंद बन चुकी है। यह पेट भरने के साथ साथ मन को भी शांति देती है।

अलग अलग राज्यों में अलग स्वाद

पंजाब में इस डिश को तब तक पूरा नहीं माना जाता जब तक यह घंटों धीमी आंच पर पककर गाढ़ी न हो जाए। इसमें पड़ने वाले पकौड़े इसकी जान होते हैं। उत्तर प्रदेश में पकौड़ों की जगह स्वादिष्ट फुलौरी डाली जाती है। गुजरात में यह एक पतली, दूधिया और खट्टी मीठी डिश बन जाती है। सिंधी कढ़ी का इतिहास सबसे अलग है। यह बंटवारे के बाद अपना घर छोड़ने वाले लोगों की हिम्मत की कहानी बताती है। इसमें दही की जगह इमली का इस्तेमाल होता है। रास्ते में जो भी सब्जी मिली, लोगों ने उसे इसमें डाल दिया और यह एक नया स्वाद बन गया।

घर की रसोई से लेकर बड़े होटलों तक का सफर

लंबे समय तक इसे सिर्फ घर का मामूली खाना माना गया। उत्तर भारत में बच्चे के जन्म के 6 दिन बाद और जन्माष्टमी पर यह मंदिरों में बनती थी। बड़े होटलों में इसे जगह नहीं मिली क्योंकि वहां महंगे खाने का राज था। बाद में जब लोगों ने अपने पारंपरिक स्वाद को पहचाना, तब इसे अपनी असली जगह मिली। आज कढ़ी चावल हम सबका पसंदीदा खाना है। इसके पैकेट विदेशों में भी भेजे जा रहे हैं। आज जब आप किसी बड़े होटल में इसे खाते हैं, तो आपको अहसास होता है कि इसका स्वाद किसी भी विदेशी सूप से बहुत बेहतर है।

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