कृष्ण कुमार सिकंदर, रायपुर। छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों एक नया दृश्य देखने को मिल रहा है। सत्ता संभालने के ढाई साल बाद सरकार के मंत्री अपने-अपने विभागों की हकीकत जानने के लिए मैदानी दौरे कर रहे हैं। मंत्री सीधे भाजपा कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं, उनसे फीडबैक ले रहे हैं और अपने विभागों से जुड़े कामकाज की जमीनी जानकारी जुटाने में लगे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि यह वास्तव में सरकार के काम करने के तरीके में आया बदलाव है या फिर आगामी मानसून सत्र से पहले की रणनीतिक तैयारी?
दरअसल, पिछले ढाई साल में विधानसभा के कई सत्रों के दौरान सरकार के मंत्रियों को विपक्ष के साथ-साथ कई बार अपने ही वरिष्ठ नेताओं के सवालों का सामना करना पड़ा है। विपक्ष लगातार विभागीय कामकाज, योजनाओं की स्थिति और सरकारी दावों को लेकर सवाल उठाता रहा है। कई मौकों पर यह भी आरोप लगे कि मंत्री सदन में अधिकारियों द्वारा तैयार किए गए जवाबों को ही दोहराते रहे, जबकि जमीनी स्थिति उससे अलग थी।
विधानसभा में मंत्री का जवाब सरकार का आधिकारिक पक्ष माना जाता है। ऐसे में जब बाद में सूचना के अधिकार (आरटीआई) से मिली जानकारी और सदन में दिए गए जवाबों में अंतर सामने आया तो सरकार की किरकिरी हुई। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया और आरोप लगाया कि अधिकारी अपने हिसाब से जवाब तैयार कर रहे हैं, जिसमें विभागीय कमियों को सामने आने से बचाने की कोशिश होती है। इसका सीधा असर मंत्रियों की छवि पर पड़ा।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा रही कि कई मंत्री अपने विभागों की वास्तविक स्थिति से पूरी तरह अवगत नहीं थे और अधिकतर जानकारी अधिकारियों के माध्यम से ही मिल रही थी। ऐसे में सदन में पूछे गए तीखे सवालों का सामना करने में उन्हें परेशानी हुई। कई बार मंत्रियों को ऐसे सवालों का जवाब देना पड़ा, जिनकी पूरी जानकारी उनके पास तत्काल उपलब्ध नहीं थी।
इसी पृष्ठभूमि में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का रायपुर दौरा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार यह दौरा केवल औपचारिक नहीं था। मानसून सत्र से पहले हुए इस दौरे में संगठन और सरकार से जुड़े कई महत्वपूर्ण लोगों के साथ बैठकें हुईं। संगठन महामंत्री अजय जामवाल, पवन साय, विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह सहित अन्य नेताओं के साथ दिनभर चर्चा के बाद शाम को मुख्यमंत्री आवास पर मंत्रियों की बैठक बुलाई गई।
इस बैठक में मंत्रियों को सदन की कार्यप्रणाली, जवाब देने के तरीके और विधानसभा की गरिमा बनाए रखने को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें बताई गईं। संदेश साफ था कि मंत्री केवल अधिकारियों की रिपोर्ट पर निर्भर न रहें, बल्कि खुद जमीन पर जाकर स्थिति को समझें। अपने विभाग की योजनाओं, उपलब्धियों और कमियों की वास्तविक जानकारी रखें ताकि विधानसभा में विपक्ष के सवालों का मजबूती से जवाब दिया जा सके।
इसके बाद अब मंत्रियों के काम करने के तरीके में बदलाव दिखाई दे रहा है। मंत्री अपने क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं, भाजपा कार्यकर्ताओं से संवाद कर रहे हैं और उनसे सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर फीडबैक ले रहे हैं। कार्यकर्ता उन्हें बता रहे हैं कि जमीन पर क्या काम हो रहा है, कहां समस्या है और किन मुद्दों को लेकर जनता नाराज या संतुष्ट है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सरकार और संगठन के बीच तालमेल मजबूत करने की कोशिश भी है। भाजपा की राजनीति में कार्यकर्ताओं को हमेशा जमीनी ताकत माना जाता है। ऐसे में मंत्रियों का सीधे कार्यकर्ताओं के बीच जाना केवल प्रशासनिक कवायद नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीति भी माना जा रहा है। हालांकि सवाल यह भी है कि यह पहल पहले क्यों नहीं हुई? सरकार बनने के बाद ही मंत्रियों को अपने विभागों की वास्तविक स्थिति समझने, कार्यकर्ताओं से संवाद करने और विधानसभा की तैयारी के लिए इस तरह की व्यवस्था बनाई जा सकती थी। अगर शुरुआत से ही मंत्रियों को उनके अधिकार, जिम्मेदारियां और सदन में जवाब देने की प्रक्रिया को लेकर मार्गदर्शन दिया जाता तो शायद कई मौकों पर सरकार को असहज स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।
ढाई साल बाद मंत्रियों का अपने कार्यालयों और फाइलों से बाहर निकलकर कार्यकर्ताओं और जनता के बीच पहुंचना एक सकारात्मक संकेत जरूर माना जा सकता है, लेकिन इसकी असली परीक्षा विधानसभा के मानसून सत्र में होगी। अब देखना होगा कि इस बदलाव का असर सदन में दिखाई देता है या फिर पहले की तरह अधिकारी तैयार जवाबों के सहारे ही सरकार का पक्ष रखा जाता है, क्योंकि विधानसभा केवल सवाल-जवाब का मंच नहीं है, बल्कि सरकार की जवाबदेही का सबसे बड़ा स्थान है। यदि मंत्री खुद अपने विभाग की हकीकत से परिचित होंगे तो न केवल सदन में बेहतर जवाब दे पाएंगे, बल्कि सरकार की कार्यशैली पर भी जनता का भरोसा बढ़ेगा।