पतझड़ और नई कलियों के निकलने का बदल रहा समय
चक्र
-पेड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी विपरीत प्रभाव
- पक्षियों और कीटों की पारिस्थितिकी में भी हो रहा बदलाव
- अनुसंधान के निष्कर्षों ने वानिकी वैज्ञानिकों को चिंता में डाला
राजकुमार मल
भाटापारा- पत्तियों का झड़ना कभी भी। नई कलियां लगने का समय बदल रहा है। प्रभावित हो रही है सर्केडियन रिदम वृक्षों की। प्रतिकूल असर वृक्षों की रोग प्रतिरोधक क्षमता के कम होने के रूप में देखा जा रहा है।
वृक्षों में सजावटी लाइटनिंग का चलन भले ही तेजी से बढ़ रहा हो लेकिन शहर की सुंदरता बढ़ाने वाली इस व्यवस्था का प्रतिकूल प्रभाव वृक्षों में प्रकाश प्रदूषण जैसी दीर्घकालिक समस्या को बढ़ा रहा है। अनुसंधान में जो खुलासे हुए हैं, उसने वानिकी वैज्ञानिकों को चिंता में डाल दिया है क्योंकि वृक्षों पर सजावटी लाइटनिंग करने की वजह से वृक्षों, पक्षियों और कीटों के साथ शहरी पारिस्थिति की तंत्र में व्यापक बदलाव देखा जा रहा है।

जैविक घड़ी में यह बदलाव
सभी वृक्षों में प्रकाश और अंधकार के आधार पर कार्य करने वाली एक जैविक घड़ी होती है। सर्केडियन रिदम के नाम से पहचानी जाती है यह घड़ी। नया परिवर्तन यह कि रात्रि के समय लगातार कृत्रिम प्रकाश मिलने की वजह से पत्तियों के झड़ने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। नई कलियों के लगने का समय बदल रहा है। महत्वपूर्ण यह कि वृक्षों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है। यह स्थिति अधिक समय तक बने रहने की भी जानकारी शोध में सामने आई है।
पक्षियों पर यह प्रभाव
वृक्ष, पक्षियों एवं कीटों के प्राकृतिक आवास माने जाते हैं। अत्यधिक प्रकाश की वजह से इनकी नींद प्रभावित हो रही है। परिवर्तन व्यवहार में बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। प्रकाश प्रदूषण की वजह से पक्षी सुबह से काफी पहले ही चहचहा रहे हैं। यह सीधे-सीधे प्रजनन चक्र को प्रभावित कर रही है। कीटों पर तेज कृत्रिम प्रकाश प्राकृतिक व्यवहार में व्यापक बदलाव ला चुका है। इससे परागण प्रक्रिया कमजोर हो रही है। जो दीर्घकालिक नुकसान की बड़ी वजह बन सकती है।

क्या कहता है संरक्षण अधिनियम ?
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने तथा प्रदूषण नियंत्रण पर बल देता है। इसके अंतर्गत अब अत्यधिक प्रकाश को भी पर्यावरणीय समस्या के रूप में देखा जाने लगा है। वृक्ष संरक्षण अधिनियमों के तहत कील ठोंकना, तार बांधना, विज्ञापन लगाना दंडनीय माना जा चुका है। सजावटी प्रकाश व्यवस्था को लेकर न्यायालय ने माना है कि वृक्ष जीवित जैविक इकाइयां है। इनकी पारिस्थितिकी भूमिका महत्वपूर्ण हैं। इसलिए अनावश्यक प्रकाश प्रदूषण से बचना चाहिए।
सुझाए यह उपाय
प्रदेश के बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग, अंबिकापुर और जगदलपुर में सौंदर्यीकरण के लिए वृक्षों पर लाइटनिंग की बढ़ती प्रवृत्ति को चिंताजनक मानते हुए वानिकी वैज्ञानिकों ने टाईमर आधारित प्रकाश व्यवस्था को अपनाने का सुझाव दिया है। इसमें रात 10 बजे के बाद लाइट स्वत: बंद हो जाती है। सीमित अवधि के लिए लाइटनिंग केवल त्योहारों एवं विशेष आयोजन के दौरान करने के उपाय मुख्य हैं। सौंदर्यीकरण एवं नगर नियोजन कार्यक्रमों में ‘वृक्ष प्रथम, सजावट बाद में’ की अवधारणा अपनाने की सलाह दी गई है।
वृक्षों की जैविक घड़ी से खिलवाड़ उचित नहीं
वृक्ष केवल सौंदर्य बढ़ाने वाले जीवित ढांचे नहीं हैं, बल्कि शहरी पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण घटक हैं। रात्रि के समय वृक्षों पर लगातार कृत्रिम प्रकाश पड़ने से उनकी प्राकृतिक जैविक घड़ी (सर्केडियन रिदम) प्रभावित होती है, जिससे पत्तियों के झड़ने, नई कलियों के निकलने तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही पक्षियों, परागण करने वाले कीटों और अन्य जीवों के व्यवहार में भी बदलाव देखने को मिलता है। इसलिए शहरी सौंदर्यीकरण के दौरान वृक्षों की पारिस्थितिक आवश्यकताओं को प्राथमिकता देते हुए सीमित और वैज्ञानिक तरीके से प्रकाश व्यवस्था की जानी चाहिए।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर