साल की सबसे कठिन निर्जला एकादशी कल: बिना पानी के रखा जाता है यह महाव्रत, एक दिन के नियम से मिलेगा पूरे चौबीस व्रतों का पुण्य

सनातन धर्म में एकादशी व्रत का बहुत बड़ा महत्व माना गया है। इनमें से सबसे ज्यादा फल देने वाली निर्जला एकादशी का व्रत कल यानी पच्चीस जून को रखा जाएगा। जैसा कि इसके नाम से ही साफ है, इस व्रत में पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है। यही वजह है कि इसे साल के सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार साल में कुल चौबीस एकादशियां आती हैं। अगर कोई व्यक्ति पूरे साल की सभी एकादशियों का व्रत नहीं कर पाता है, तो वह केवल इस एक एकादशी का व्रत करके उन सभी व्रतों के बराबर पुण्य कमा सकता है। शास्त्रों में इस दिन श्रद्धा और नियम से की गई पूजा को बेहद शुभ और सुख-समृद्धि देने वाला बताया गया है।

द्रिक पंचांग के अनुसार एकादशी की तिथि आज यानी चौबीस जून की शाम छह बजकर बारह मिनट से शुरू हो रही है। यह तिथि अगले दिन यानी पच्चीस जून को रात आठ बजकर नौ मिनट तक रहेगी। हिंदू धर्म में उदयातिथि यानी सूर्योदय के समय रहने वाली तिथि को मुख्य माना जाता है। इसी नियम के कारण व्रत पच्चीस जून को ही रखा जाएगा। इसके बाद व्रत खोलने का समय यानी पारण छब्बीस जून की सुबह पांच बजकर पच्चीस मिनट से लेकर सुबह आठ बजकर तेरह मिनट तक रहेगा। इस दौरान व्रत करने वाले लोग अपना उपवास पूरा कर सकते हैं।

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महाबली भीम से जुड़ी है इस व्रत की अनोखी कहानी, गर्मी के मौसम में जल और अन्न के दान का है विशेष महत्व

इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने और साफ कपड़े पहनने की परंपरा है। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। घर के मंदिर में भगवान की पूजा करके दीपक जलाया जाता है। जो लोग पूरी तरह बिना पानी के व्रत नहीं रख सकते, वे अपने स्वास्थ्य को देखते हुए जल और फल लेकर भी पूजा कर सकते हैं। इस व्रत में दान का भी बहुत खास महत्व बताया गया है। भीषण गर्मी के इस मौसम में राहगीरों और जरूरतमंदों को पानी पिलाना, फल, अनाज और कपड़ों का दान करना बहुत पुण्य का काम माना जाता है। विशेष रूप से जल का दान इस दिन सबसे उत्तम फल देता है।

इस व्रत को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। महाभारत काल में पांडव पुत्र भीमसेन को भोजन बहुत प्रिय था और उनके लिए हर महीने व्रत रखना नामुमकिन था। तब उन्हें ऋषियों ने सलाह दी कि वे साल में सिर्फ एक बार इस निर्जला एकादशी का कठिन व्रत पूरी निष्ठा से करें। भीम ने ऐसा ही किया और उन्हें सभी एकादशियों का फल मिल गया। इसी वजह से इसका नाम भीमसेनी एकादशी पड़ा। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करने से मानसिक शांति मिलती है और सभी कष्ट दूर होते हैं।

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