सुभाष मिश्र
मातृत्व प्रकृति का सबसे बड़ा चमत्कार है। सदियों से स्त्रियां प्रसव पीड़ा सहकर नई जिंदगी को जन्म देती रही हैं। यह पीड़ा केवल शारीरिक नहीं होती, बल्कि सृजन की उस प्रक्रिया का हिस्सा होती है जिसने मानव सभ्यता को आगे बढ़ाया है। लेकिन बदलते समय के साथ मातृत्व का यह स्वाभाविक स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। आज शहरों में सामान्य प्रसव की जगह सिज़ेरियन ऑपरेशन से बच्चों के जन्म का चलन लगातार बढ़ रहा है। सवाल यह है कि क्या यह केवल चिकित्सा विज्ञान की प्रगति की सुविधा का परिणाम है या इसके पीछे सुविधाभोगी जीवनशैली, प्रसव पीड़ा से बचने की मानसिकता और निजी अस्पतालों की कथित धन लोलुप प्रवृत्तियां भी जिम्मेदार हैं?
चिकित्सा विज्ञान ने निस्संदेह सिज़ेरियन को एक जीवनरक्षक तकनीक के रूप में विकसित किया है। जब मां या गर्भस्थ शिशु के जीवन पर संकट हो, तब ऑपरेशन ही सबसे सुरक्षित विकल्प होता है। लेकिन चिंता इसलिए बढ़ गई है कि यह अपवाद अब सामान्य स्थिति बन गई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़े बताते हैं कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों में सिजेरियन ऑपरेशन की दर लगातार बढ़ रही है। मध्यप्रदेश में चार वर्षों में यह दर 12 प्रतिशत से बढ़कर 16 प्रतिशत हो गई है। छत्तीसगढ़ में यह बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि राजस्थान में भी लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। इन आंकड़ों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शहर और गांव का अंतर है। मध्यप्रदेश के शहरों में 33.9 प्रतिशत महिलाओं ने ऑपरेशन के जरिए बच्चों को जन्म दिया, जबकि गांवों में यह आंकड़ा केवल 11 प्रतिशत है। छत्तीसगढ़ में शहरी क्षेत्रों में 41.8 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 15.7 प्रतिशत प्रसव सीज़ेरियन से हुए। राजस्थान में भी यही तस्वीर दिखाई देती है। यदि चिकित्सा आवश्यकता ही एकमात्र कारण होती तो शहर और गांव के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों दिखाई देता?
डॉक्टर्स इस बात को जीवनशैली का बदलाव बताते हैं। गांव की महिलाएं आज भी खेतों, घर और रोजमर्रा के कार्यों में सक्रिय रहती हैं। गर्भावस्था के दौरान भी उनका श्रम पूरी तरह समाप्त नहीं होता। इसके विपरीत शहरों में सुविधाओं का विस्तार हुआ है, शारीरिक श्रम कम हुआ है और जीवन अधिक आरामदायक होता गया है। गर्भावस्था के दौरान आवश्यक शारीरिक सक्रियता और व्यायाम की कमी भी सामान्य प्रसव की संभावनाओं को प्रभावित करती है, लेकिन अधिकांश लोगों को यह तर्क स्वीकार नहीं है। गांवों में स्त्रियां यदि खेतों में और घरों में काम कर रही है तो शहरों में भी स्त्रियां बिल्कुल हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी हैं। वह नौकरी पर जा रही है। जो समर्थ है वह जिम जा रही हैं। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है। व्यायाम और योग का चलन बढ़ा है।
एक दूसरा पक्ष व्यावसायिक और गंभीर है। आंकड़े बताते हैं कि मध्यप्रदेश में 61.7 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 64.9 प्रतिशत और राजस्थान में 35 प्रतिशत सिज़ेरियन प्रसव निजी अस्पतालों में हुए, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह प्रतिशत लगभग 10 से 12 के बीच है। इसी बड़े अंतर के कारण लोग प्राइवेट अस्पतालों को धंधे की जगह में बदलने का आरोप लगाते हैं। सामान्य प्रसव की तुलना में सीज़ेरियन ऑपरेशन में अस्पतालों की आय अधिक होती है, इसलिए समय-समय पर यह आरोप सामने आते रहे हैं कि जहां सामान्य प्रसव संभव होता है, वहां भी परिजनों को मेडिकल इमरजेंसी का हवाला देकर ऑपरेशन के लिए तैयार कर लिया जाता है।
आंकड़े बताते हैं कि सरकारी अस्पताल में एक स्त्री के प्रसव पर खर्च अधिकतम दस हजार रुपए आता है लेकिन छोटे और मध्यम शहरों के निजी अस्पतालों में यह खर्च अस्सी हजार रुपए तक जाता है और बड़े शहरों के निजी अस्पतालों में या खर्च डेढ़ लाख रुपए तक पहुंच जाता है और बड़े ताज्जुब की बात यह है कि कॉर्पोरेट अस्पताल में यह खर्च तीन लाख रुपए तक चला जाता है। सरकारी अस्पताल के अधिकांश डॉक्टर नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं कि प्राइवेट अस्पतालों में जहां जरूरत नहीं होती वहां भी स्त्री के प्रसव की जटिल स्थिति बताकर स्त्री या उसके परिवार को सिजेरियन प्रसव के लिए दबाव बनाया जाता है और कभी-कभी तो सिजेरियन ऑपरेशन को भी और जटिल बताकर और ज्यादा पैसे वसूले जाते हैं। यह समस्या केवल प्रसव तक सीमित नहीं है। चिकित्सा क्षेत्र में बढ़ते व्यावसायीकरण को लेकर समाज में लगातार असंतोष बढ़ रहा है।
मामूली उपचार से ठीक होने वाली बीमारियों में मरीजों को भर्ती करना, अनावश्यक जांचें कराना, जरूरत से अधिक दवाइयां लिखना, आईसीयू और वेंटिलेटर के इस्तेमाल को लेकर उठते सवाल इन सभी घटनाओं ने लोगों के मन में अविश्वास पैदा किया है। वर्तमान में अनुमानित आंकड़े बताते हैं कि प्राइवेट अस्पतालों का वार्षिक कारोबार दस लाख करोड़ से अधिक का है। इस वार्षिक कारोबार में डॉक्टर्स की आय कथित रूप से दो से तीन लाख करोड़ के आसपास है। यह एक बहुत बड़ा तंत्र है। इसमें फार्मेसी उद्योग भी जुड़ा हुआ है। भारतीय दवा बाजार इस समय पाँच लाख करोड़ से अधिक का हो चुका है। इन कथित आरोपों पर तो अब कोई ध्यान भी नहीं देता है कि दो रुपए की दवाई बनाने में जो खर्च आता है वह बाजार में पचास रुपए कम मूल्य लगाकर बेची जाती है।
आम जन के इन आरोपों में थोड़ी बहुत भावुकता या कमी बेशी हो सकती है, लेकिन सच्चाई का हिस्सा बहुत ज्यादा है। वरना जब सरकार भी बार-बार कार्रवाई का आश्वासन देती है और कुछ कार्रवाई दिखाई भी देती है लेकिन स्वास्थ्य सेवा अब सेवा से हटकर एक बड़े धंधे में बदल रही है, इसका कहीं कोई हल दिखाई नहीं देता है। विदेशों में स्थिति कुछ अलग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि सिज़ेरियन
प्रसव केवल चिकित्सकीय आवश्यकता होने पर ही किया जाना चाहिए। कई विकसित देशों में सामान्य प्रसव को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष प्रशिक्षण, काउंसलिंग और प्राकृतिक प्रसव केंद्रों की व्यवस्था की गई है। वहां यह समझ विकसित की गई है कि प्रसव पीड़ा कोई बीमारी नहीं बल्कि मातृत्व की स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है। हमारे यहां भी आशा कार्यकर्ता, एएनएम और प्रशिक्षित दाइयों के माध्यम से संस्थागत और सुरक्षित सामान्य प्रसव को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन कोई ठोस हल नहीं सामने है।
निस्संदेह हर स्त्री मां बनना चाहती है। भारतीय समाज में आज भी मातृत्व को स्त्री की पूर्णता से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि टेस्ट ट्यूब बेबी, आईवीएफ और सरोगेसी जैसी तकनीकों का बाजार भी तेजी से फैल रहा है। बांझपन को लेकर सामाजिक दबाव और मातृत्व की आकांक्षा ने चिकित्सा क्षेत्र में एक बड़ा बाजार खड़ा कर दिया है। लेकिन इस बाजार के विस्तार के बीच यह नहीं भूलना चाहिए कि मातृत्व कोई उत्पाद नहीं है और न ही प्रसव केवल एक व्यावसायिक सेवा।
सिज़ेरियन को गलत ठहराना उचित नहीं होगा। लाखों महिलाओं और नवजातों की जान बचाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि सामान्य प्रसव को अनावश्यक रूप से सिजेरियन में बदलने की व्यावसायिक कोशिश ना की जाए। गर्भवती महिलाओं को उचित परामर्श, नियमित व्यायाम, पोषण और मानसिक तैयारी के माध्यम से प्राकृतिक प्रसव के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। साथ ही उन अस्पतालों और संस्थानों की निगरानी भी आवश्यक है जहां सीज़ेरियन की दर असामान्य रूप से अधिक है। अस्पतालों की जवाबदेही सुनिश्चित हो और हर ऑपरेशन केवल वहीं किया जाए जहां उसकी वास्तविक आवश्यकता हो। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब सामान्य प्रसव अपवाद बन जाएगा और मातृत्व भी बाजार की एक और वस्तु में बदलकर रह जाएगा।