कब बदलेगा किसान का धान पर से भरोसा

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ राज्य बने 25 वर्ष पूरे होने वाले हैं। इन 25 वर्षों में सरकारें बदलीं, राजनीतिक दल बदले, योजनाएं बदलीं और कृषि नीतियों के नाम भी बदलते रहे, लेकिन एक चीज नहीं बदली-धान पर किसान का भरोसा। राज्य गठन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने ‘फसल चक्र परिवर्तनÓ का व्यापक अभियान चलाया था। उस समय यह तर्क दिया गया कि किसान केवल धान पर निर्भर न रहें और दलहन, तिलहन, मक्का तथा अन्य लाभकारी फसलों की ओर बढ़ें। इसके बाद डॉ. रमन सिंह के 15 वर्षों के कार्यकाल में भी कृषि विभाग ने फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएं और कार्यक्रम चलाए। अब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार ने खरीफ 2026 से कृषक उन्नति योजना का नया स्वरूप लागू करने का निर्णय लिया है, जिसके तहत धान के स्थान पर दलहन, तिलहन, मक्का, कोदो, कुटकी, रागी और कपास जैसी फसलें लगाने वाले किसानों को प्रति एकड़ 15 हजार रुपये की सहायता देने की घोषणा की गई है। सरकार का मानना है कि इससे फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा, भूजल संरक्षण होगा, मिट्टी की उर्वरता सुधरेगी और किसानों की आय में भी वृद्धि होगी।
वास्तव में यह सोच केवल छत्तीसगढ़ सरकार की नहीं है। पिछले एक दशक से अधिक समय से केंद्र सरकार भी फसल विविधीकरण को कृषि नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाए हुए है। वर्ष 2013-14 में शुरू किए गए फसल विविधीकरण कार्यक्रम को बाद में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत और मजबूती दी गई। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों से हटकर दालें, तिलहन, मोटे अनाज और अन्य वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने की नीति अपनाई गई। वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष के रूप में मनाया गया। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय तिलहन मिशन, प्रति ड्रॉप मोर क्रॉप, प्राकृतिक खेती मिशन और हाल में शुरू की गई प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना जैसी अनेक योजनाओं का मूल उद्देश्य भी यही है कि खेती को अधिक टिकाऊ, जलवायु अनुकूल और विविधतापूर्ण बनाया जा सके। सरकारों का तर्क भी पूरी तरह तर्कसंगत है। धान की तुलना में दलहन, तिलहन, मक्का और मोटे अनाज कम पानी मांगते हैं। फलीदार फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करके उसकी उर्वरता बढ़ाती हैं। विविध फसलें किसानों के जोखिम को कम करती हैं, पोषण सुरक्षा बढ़ाती हैं और जलवायु परिवर्तन के दौर में अधिक टिकाऊ कृषि व्यवस्था तैयार करती हैं।
लेकिन सवाल यह है कि यदि नीति इतनी अच्छी है और पिछले 25 वर्षों से लगातार इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं, तो किसान आज भी धान से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा? इसका उत्तर स्वयं कृषि और सरकारी आंकड़ों में छिपा हुआ है। छत्तीसगढ़ में धान का रकबा घटने के बजाय लगातार बढ़ा है। उत्पादन बढ़ा है। समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीदी लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है। आज राज्य में 100 लाख मीट्रिक टन से अधिक धान की सरकारी खरीदी संभव हो रही है और लाखों किसानों की आय सीधे इस व्यवस्था से जुड़ी हुई है। यही वह बिंदु है जहां फसल विविधीकरण की नीति और व्यवहारिक कृषि अर्थशास्त्र के बीच टकराव दिखाई देता है। एक ओर सरकार किसानों से कहती है कि वे धान छोड़कर दूसरी फसलों की ओर बढ़ें, दूसरी ओर सबसे मजबूत आर्थिक सुरक्षा कवच भी धान को ही उपलब्ध कराती है। समर्थन मूल्य की गारंटी, सरकारी खरीदी, बोनस, भुगतान की सुनिश्चित व्यवस्था और चुनावी राजनीति का केंद्र भी धान ही बना हुआ है। ऐसे में किसान जोखिम क्यों उठाए?
किसान का निर्णय केवल कृषि विज्ञान के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा के आधार पर होता है। कृषि वैज्ञानिक चाहे जितने लाभ गिना दें, किसान सबसे पहले यह देखता है कि उसकी फसल खरीदेगा कौन, उचित मूल्य देगा कौन और नुकसान होने पर उसके साथ खड़ा कौन होगा। धान के मामले में इन सभी सवालों के जवाब स्पष्ट हैं। लेकिन दलहन, तिलहन, मक्का या मोटे अनाजों के मामले में अभी भी बाजार की अनिश्चितता बनी हुई है। यही कारण है कि फसल विविधीकरण का सबसे बड़ा संकट कृषि तकनीक का नहीं, बल्कि बाजार और नीति का संकट है। जब तक वैकल्पिक फसलों के लिए भी धान जैसी खरीद व्यवस्था, भंडारण क्षमता, प्रसंस्करण उद्योग और मूल्य समर्थन तंत्र विकसित नहीं होगा, तब तक किसान केवल प्रोत्साहन राशि के भरोसे अपनी पूरी कृषि व्यवस्था बदलने को तैयार नहीं होगा।
इसका एक सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी है। छत्तीसगढ़ की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है और कृषि का बड़ा हिस्सा वर्षा आधारित है। खरीफ में धान की खेती होती है, लेकिन उसके बाद बड़ी मात्रा में भूमि खाली रह जाती है। रबी फसलों का विस्तार सीमित है। परिणामस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में वर्ष के कई महीनों तक रोजगार के अवसर नहीं बन पाते। मनरेगा जैसी योजनाओं ने कुछ राहत अवश्य दी है, लेकिन वे कृषि आधारित स्थायी आय का विकल्प नहीं बन सकीं। यही कारण है कि बड़ी संख्या में ग्रामीण आबादी अतिरिक्त आय की तलाश में शहरों की ओर पलायन करती है। कई छोटे किसान खेती से पर्याप्त आय नहीं मिलने के कारण धीरे-धीरे मजदूर में परिवर्तित होते दिखाई देते हैं। विडंबना यह है कि जिस फसल विविधीकरण को सरकारें रोजगार, आय वृद्धि और कृषि स्थिरता का समाधान मानती हैं, वह लक्ष्य अभी तक जमीन पर पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया है।
इसके लिए केवल किसानों को दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा। किसान वही करता है जो उसे सबसे सुरक्षित और व्यवहारिक विकल्प दिखाई देता है। यदि सरकार धान के लिए मजबूत सुरक्षा जाल बनाए रखेगी और दूसरी फसलों के लिए केवल सलाह, प्रशिक्षण और सीमित प्रोत्साहन उपलब्ध कराएगी, तो स्वाभाविक रूप से किसान धान की ओर ही आकर्षित रहेगा। फसल विविधीकरण का असली प्रश्न यह नहीं है कि किसान बदलना क्यों नहीं चाहता, बल्कि यह है कि क्या सरकारें धान के समान मजबूत बाजार, खरीदी और मूल्य सुरक्षा तंत्र वैकल्पिक फसलों के लिए खड़ा कर पाई हैं? पिछले पच्चीस वर्षों का अनुभव बताता है कि उत्तर अभी भी संतोषजनक नहीं है।
यदि छत्तीसगढ़ को वास्तव में धान आधारित कृषि से बहुफसली कृषि व्यवस्था की ओर ले जाना है, तो केवल प्रति एकड़ 15 हजार रुपये की सहायता पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए समर्थन मूल्य के प्रभावी क्रियान्वयन, खरीद की गारंटी, प्रसंस्करण उद्योगों के विस्तार, भंडारण सुविधाओं के निर्माण, किसान उत्पादक संगठनों की मजबूती और मजबूत बाजार नेटवर्क की आवश्यकता होगी। जब किसान को यह भरोसा हो जाएगा कि धान के अलावा दूसरी फसलें भी उतनी ही सुरक्षित और लाभकारी हैं, तभी फसल विविधीकरण की नीति वास्तविक सफलता प्राप्त कर सकेगी। अन्यथा योजनाओं के नाम बदलते रहेंगे, घोषणाएं होती रहेंगी, प्रोत्साहन राशि बढ़ती रहेगी, लेकिन छत्तीसगढ़ का किसान वहीं खड़ा रहेगा जहां वह पिछले पच्चीस वर्षों से खड़ा है—धान के खेत में।

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