कागजों में सिमटी गौधाम योजना : सड़कों पर मौत के मुंह में समा रहा गोवंश

आज की जनधारा संवाददाता: अनुप वर्मा (चारामा) *
​कागजों में सिमटी ‘गौधाम योजना’: चारामा समेत छत्तीसगढ़ के किसी भी निकाय में नहीं दिख रहा असर, सड़कों पर मौत के मुंह में समा रहा गोवंश
​चारामा। छत्तीसगढ़ की साय सरकार द्वारा गोवंश के संरक्षण और संवर्धन के बड़े-बड़े दावों के साथ शुरू की गई ‘गौधाम योजना’ जमीनी स्तर पर पूरी तरह विफल नजर आ रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय द्वारा बीते 14 मार्च 2026 को इस योजना का प्रदेश में औपचारिक शुभारंभ तो कर दिया गया, लेकिन विडंबना यह है कि आज योजना लागू हुए महीनों बीत जाने के बाद भी प्रदेश के किसी भी नगर पंचायत, नगरपालिका, नगर निगम या ग्राम पंचायत में इसे धरातल पर नहीं उतारा जा सका है।


​तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि आज भी बेसहारा गोवंश सड़कों पर भटकने को मजबूर है और आए दिन सड़क हादसों में बेमौत मर रहा है।
​कम मानदेय और बजट का रोड़ा: कोई भी समिति हाथ आगे बढ़ाने को तैयार नहीं
​शासन द्वारा जारी विज्ञापन में बुनियादी ढांचा निर्माण के लिए सालाना 5 लाख रुपये, चारा विकास के लिए 47 हजार से 2.85 लाख रुपये और गोसेवकों व चरवाहों के लिए क्रमश: 13,126 रुपये और 10,916 रुपये प्रति माह मानदेय देने की बात कही गई है। साथ ही पोषण आहार के लिए पहले वर्ष 10 रुपये प्रतिदिन प्रति पशु और चौथे वर्ष तक इसे अधिकतम 35 रुपये करने का प्रावधान है।
​लेकिन धरातल पर काम करने वाली समितियों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में गोवंश के रखरखाव, उचित पोषण और मजदूरी के लिहाज से यह सरकारी बजट और मानदेय बेहद ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। यही वजह है कि कोई भी पंजीकृत गौशाला समिति, एनजीओ या ट्रस्ट इस योजना के तहत सिर्फ समितियों के भरोसे जिम्मेदारी लेने आगे नहीं आ रहा है।
​गोपालकों और ग्रामीणों की मांग: ‘वरदान’ साबित हुई पूर्ववर्ती सरकार की गोधन न्याय योजना को फिर किया जाए सक्रिय
​योजना की विफलता के बीच स्थानीय ग्रामीणों, पशुपालकों और गौसेवकों ने अपनी पुरानी मांग बुलंद की है। उनका कहना है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के समय लागू की गई ‘गोधन न्याय योजना’ वाकई में जमीन पर गायों, गोपालकों और भूमिहीनों के लिए वरदान साबित हो रही थी। उस दौरान गठानों में गोबर और गौमूत्र की सरकारी खरीदी होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली थी।
​गठानों में वर्मी कंपोस्ट (खाद) बनाने से लेकर गोबर से दिए, गमले और अन्य सामग्रियां बनाने का काम बड़े पैमाने पर चल रहा था, जिससे आम नागरिकों और विशेषकर महिला स्व-सहायता समूहों की आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार आ रहा था। पैसों के लालच में लोग गायों को खुला छोड़ने के बजाय बांधकर रखते थे, जिससे गायों का भी बेहतर संरक्षण हो रहा था।


​पशुपालकों की मांग है कि सरकार केवल नई समितियों के भरोसे इस योजना को न छोड़े, बल्कि पुराने गठानों को फिर से पूरी तरह सक्रिय करे और उनमें पहले की तरह महिला समूहों को जोड़कर काम शुरू कराया जाए, ताकि गोवंश भी बचे और ग्रामीणों को रोजगार भी मिले।
​चारामा ब्लॉक में एक भी समिति ने नहीं दिखाई रुचि
​अगर स्थानीय स्तर पर चारामा क्षेत्र की बात करें, तो यहां भी योजना के क्रियान्वयन की स्थिति शून्य है। सरकारी दावों के मुताबिक गठानों में चारे की व्यवस्था की जानी थी, गायों को वहां सुरक्षित रखकर समितियों के माध्यम से उनका पालन-पोषण कराया जाना था। मगर हकीकत यह है कि चारामा ब्लॉक में अभी तक एक भी समिति ने इस नई योजना में सहभागिता के लिए आवेदन या रुचि नहीं दिखाई है।
​दावे बड़े, हकीकत शून्य
​सरकार एक तरफ “संरक्षण भी, संवर्धन भी” का नारा देकर अपनी पीठ थपथपा रही है, तो वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत इस योजना की विफलता की कहानी खुद बयां कर रही है। जब तक सरकार मानदेय और चारे के बजट में व्यावहारिक सुधार नहीं करती और पूर्व की तरह महिला समूहों व जमीनी आर्थिक मॉडल को इसमें शामिल नहीं करती, तब तक कागजी गोसेवा के बीच बेजुबान सड़कों पर यूं ही दम तोड़ते रहेंगे और यह महत्वाकांक्षी योजना सिर्फ विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाएगी।

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