सैनिक स्कूलों में संस्थागत कदाचार और प्रशासनिक मनमानी का गहराता साया

भारतीय सैन्य व्यवस्था से संचालित शिक्षण संस्थान, विशेष रूप से सैनिक स्कूल, देश के भावी सैन्य नेतृत्व को तैयार करने वाले गौरवशाली स्तंभ माने जाते हैं। इन संस्थानों की रीढ़ इनकी शुचिता, योग्यता और अनुशासन पर टिकी होती है। किंतु पिछले कुछ वर्षों में उभरे कई गंभीर मामलों, प्रशासनिक दस्तावेजों और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के अपीलीय निर्णयों से यह संकेत मिलता है कि इन संस्थानों की आंतरिक कार्यप्रणाली और प्रशासनिक शुचिता एक बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। प्रशासनिक मनमानी, भ्रष्टाचार के आरोपों पर चुप्पी और वरिष्ठ अधिकारियों के कथित संरक्षण ने इन गरिमामायी स्कूलों की साख पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

पद का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
प्रशासनिक गलियारों और संबंधित दस्तावेजों से यह स्पष्ट रूप से उजागर हुआ है कि सैनिक स्कूल संगठन के भीतर उच्च पदों पर आसीन कुछ अधिकारियों की भूमिका संदेहास्पद रही है।

रियर एडमिरल गोरंटला रामबाबू पर आरोप: भारतीय नौसेना के अधिकारी रियर एडमिरल गोरंटला रामबाबू (70342-T), जो पूर्व में सैनिक स्कूल अंबिकापुर के प्रधानाचार्य (कप्तान, भारतीय नौसेना के रूप में) रह चुके हैं, पर गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप लगे हैं।

नियुक्ति और निविदाओं में गड़बड़ी: वर्ष 2015 से 2020 के बीच स्थापित किए गए नए सैनिक स्कूलों में योग्यता को ताक पर रखकर प्रधानाचार्यों की पोस्टिंग करने, उन पर दबाव बनाकर मनमाना नियोजन (Recruitment) करवाने और अपनी पसंद के ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाते हुए निविदाएं (Contracts) आवंटित करने के संगीन आरोप उन पर मढ़े गए हैं।

नौसेना की भूमिका पर सवाल: सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन गंभीर और स्पष्ट आरोपों के बावजूद संबंधित अधिकारी के खिलाफ कोई ठोस दंडात्मक या सुधारात्मक कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की गई। इसके विपरीत, रक्षा प्रणाली और भारतीय नौसेना द्वारा इन परदों के पीछे चल रहे घालमेल को नजरअंदाज करते हुए उन्हें निरंतर पदोन्नत (Promoted) किया जाता रहा, जो कि ‘ईमानदारी और संस्थागत शुचिता’ के स्थापित मानदंडों के सर्वथा विपरीत है।

सैनिक स्कूल अंबिकापुर: दमन और कथित रिश्वतखोरी का मामला

संस्थागत भ्रष्टाचार का एक बेहद चौंकाने वाला और प्रत्यक्ष उदाहरण सैनिक स्कूल अंबिकापुर के प्रशासनिक रिकॉर्ड्स और व्हाट्सएप संवादों में देखने को मिलता है।

  1. पाँच लाख की कथित रिश्वत की मांग

संस्थान के ही एक प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (TGT) रोशन कुमार (‘Roushan Kumar Ssap’) के एक प्रामाणिक चैट स्क्रीनशॉट से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि तत्कालीन प्रधानाचार्य जी. रामबाबू के कार्यकाल के दौरान एक कर्मचारी (‘JK Singh’, ऑफिस सुपरिटेंडेंट) के नौकरी स्थायीकरण (Job Confirmation) के एवज में 5 लाख रुपये की रिश्वत मांगी गई थी। रिश्वत की इस नाजायज रकम को देने से साफ इनकार करने के फलस्वरूप, उक्त कर्मचारी को दुर्भावनापूर्ण तरीके से सेवा से बर्खास्त (Terminate) कर दिया गया और उनके खिलाफ मनगढ़ंत आधार तैयार किए गए। उक्त शिक्षक ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच होने पर इस सच्चाई के पक्ष में आधिकारिक बयान देने की इच्छा भी प्रकट की है।

  1. मनगढ़ंत जांच समितियां (Fact Finding Boards)

दस्तावेजों के बारीक विश्लेषण से पता चलता है कि जब उक्त कर्मचारी ने संस्थान के भीतर चल रहे वित्तीय घपलों (जैसे सौर ऊर्जा कुकिंग प्लांट की खरीद के टेंडर) की गोपनीयता और शुचिता को बनाए रखने के लिए प्रयास किए, तो उनके खिलाफ आंतरिक स्तर पर एक ‘एक सदस्यीय जांच समिति’ (One Man Board) खड़ी कर दी गई। इस समिति ने कार्यस्थल पर उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के झूठे तथा आधारहीन आरोप लगाकर कर्मचारी को पूरी तरह से फंसाने और उनकी सेवा समाप्ति का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य किया।

  1. विरोधाभासी मूल्यांकन रिकॉर्ड
    दस्तावेजों में यह स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है:

20 दिसंबर 2013: कार्यवाहक प्रधानाचार्य लेफ्टिनेंट कर्नल एस.एस. सिंह द्वारा कर्मचारी की ईमानदारी, सीधेपन, और प्रवेश परीक्षा व आधिकारिक प्रक्रियाओं के सुदृढ़ीकरण में उनकी उत्कृष्ट कार्यक्षमता की लिखित सराहना (Appreciation Letter) की जाती है।

फरवरी-मार्च 2014: अचानक तत्कालीन मुख्य प्रधानाचार्य कैप्टन जी. रामबाबू द्वारा उनके प्रदर्शन को असंतोषजनक बताते हुए पहले परिवीक्षा अवधि (Probation Period) को बढ़ाया जाता है और महज कुछ ही दिनों के भीतर 28 मार्च 2014 से उनकी सेवाएं पूरी तरह समाप्त कर दी जाती हैं। यह त्वरित बदलाव किसी प्रशासनिक सुधार का हिस्सा नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रतिशोध और दुर्भावना का स्पष्ट परिचायक प्रतीत होता है।

पारदर्शिता का गला घोंटता तंत्र: सीआईसी (CIC) की भूमिका
इस पूरे मामले में पारदर्शिता और न्याय की लड़ाई को तब और बड़ा धक्का लगा जब सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत मांगी गई सूचनाओं को भी दबाने का प्रयास किया गया।

पीड़ित कर्मचारी द्वारा केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के समक्ष फाइल संख्या: CIC/DODEF/A/2017/609519/SD के तहत अपील दायर की गई थी।

अपीलकर्ता ने अपने खिलाफ इस्तेमाल की गई कथित ऑडियो/वीडियो क्लिपिंग, गवाहों के बयान और बर्खास्तगी से जुड़े साक्ष्य मांगे थे।

तत्कालीन जन सूचना अधिकारी (CPIO) और संस्थान के प्रतिनिधियों ने आयोग के सामने यह दावा कर दिया कि “ऐसा कोई ऑडियो/वीडियो रिकॉर्ड अस्तित्व में ही नहीं है” और कर्मचारी को केवल उसकी ‘असंतोषजनक परिवीक्षा अवधि’ के आधार पर निकाला गया है।

यह स्थिति दर्शाती है कि कैसे संस्थान के भीतर अपनी ही कमियों और साजिशों को छिपाने के लिए आरटीआई जैसे मजबूत कानून के समक्ष भी रिकॉर्ड्स की उपलब्धता को नकार दिया जाता है।

सैनिक स्कूलों जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में इस प्रकार की अराजकता, कथित उगाही, और योग्य व ईमानदार कर्मियों का दमन राष्ट्रीय सुरक्षा और शिक्षा दोनों के भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि शीर्ष सैन्य नेतृत्व और रक्षा मंत्रालय इन मामलों का स्वतः संज्ञान लेकर रियर एडमिरल गोरंटला रामबाबू जैसे अधिकारियों के पूरे कार्यकाल और उनके द्वारा किए गए नियोजनों व ठेकों की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच (जैसे CBI जांच) सुनिश्चित नहीं करता है, तो इन संस्थाओं से ‘ईमानदारी और राष्ट्रभक्ति’ के आदर्शों के साथ निकलने वाले कैडेट्स के मनोबल पर इसका अत्यंत विपरीत और गहरा प्रभाव पड़ेगा। शुचिता की रक्षा के लिए इस तंत्र की तत्काल ओवरहॉलिंग अनिवार्य है।

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