सेहत खराब हो रही खेतीहर भूमि की: छत्तीसगढ़ में बढ़ती गर्मी और रसायन बिगाड़ रहे मिट्टी का हाजमा, धान के कटोरे पर संकट

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ को अपनी उपजाऊ जमीन और घने जंगलों की वजह से ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है। लेकिन अब यहां की खेतीहर जमीन की सेहत लगातार बिगड़ रही है। (Chhattisgarh agriculture) एक नए खुलासे के मुताबिक, बढ़ती गर्मी और बेमौसम बारिश की वजह से मिट्टी की जैविक गुणवत्ता (organic quality of soil) खत्म होती जा रही है। अब किसानों के सामने बड़ा सवाल यह है कि मिट्टी इस चिलचिलाती धूप और पानी को आखिर कब तक संभाल पाएगी?

20 सालों में मिट्टी से गायब हुआ कार्बन, जल धारण क्षमता खत्म

एक हालिया अध्ययन में छत्तीसगढ़ की जमीन को लेकर चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं। साल 2001 से 2021 के बीच राज्य में भूमि-क्षरण (land degradation) और मिट्टी के कार्बनिक पदार्थों में भारी कमी दर्ज की गई है।

मिट्टी खराब होने की मुख्य वजहें:

  • केमिकल का अंधाधुंध इस्तेमाल: खेतों में अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों (chemical fertilizers) का छिड़काव।
  • जरूरत से ज्यादा जुताई: ट्रैक्टरों से बार-बार गहरी जुताई करने से मिट्टी की प्राकृतिक संरचना टूट रही है।
  • पराली और फसल अवशेष जलाना: कटाई के बाद खेतों में ही अवशेषों को आग के हवाले करने से मित्र बैक्टीरिया और केंचुआ जैसे सूक्ष्मजीव मर रहे हैं।

इन सब कारणों से कई इलाकों में मिट्टी की पानी सोखने और उसे रोक कर रखने की क्षमता (water holding capacity) लगभग खत्म हो चुकी है।

स्वस्थ बनाम अस्वस्थ मिट्टी: स्पंज की तरह काम करती है अच्छी जमीन

पर्यावरण में आ रहे बदलावों के अध्ययन से पता चला है कि छत्तीसगढ़ के कृषि क्षेत्रों में तापमान बढ़ना और अनियमित मानसून किसानों की चिंता बढ़ा रहा है।

दरअसल, जिस मिट्टी में पर्याप्त कार्बन और जैविक तत्व होते हैं, वह एक ‘स्पंज’ की तरह काम करती है। वह पानी को रोक कर रखती है, जिससे खेतों का तापमान सामान्य रहता है। इसके उलट, रसायनों से सूखी और कठोर हो चुकी मिट्टी धूप पड़ते ही भट्टी की तरह तपने लगती है। यह गर्मी पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचाती है, जिसे विज्ञान की भाषा में ‘हीट स्ट्रेस’ (heat stress on crops) कहा जाता है।

मिट्टी को बंजर होने से बचाना है, तो करने होंगे ये 4 काम

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते खेतों की सेहत नहीं सुधारी गई, तो आने वाले दिनों में सूखा और फसलों की उत्पादकता में भारी गिरावट (drop in crop yield) जैसी गंभीर चुनौतियां सामने खड़ी होंगी। इसके लिए मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाना बेहद जरूरी है:

  1. गोबर और वर्मी कंपोस्ट: खेतों में रासायनिक खाद की जगह गोबर खाद और केंचुआ खाद (vermi-compost) का इस्तेमाल बढ़ाना होगा। हरी खाद और बायोचार भी इसके अच्छे विकल्प हैं।
  2. मल्चिंग तकनीक अपनाएं: सूखी घास, पत्तियां और फसल के अवशेषों से मिट्टी की ऊपरी सतह को ढंकना (mulching) चाहिए। इससे कड़क धूप में भी मिट्टी की नमी बरकरार रहती है।
  3. कम जुताई: बार-बार और बहुत गहरी जुताई करने से बचना होगा ताकि मिट्टी की पकड़ ढीली न हो।
  4. एग्रोफोरेस्ट्री (कृषि-वानिकी): खेतों की मेढ़ों पर पेड़ लगाने से छाया मिलती है, जिससे नमी बची रहती है और कार्बन संचयन (carbon sequestration) में मदद मिलती है।

लोकल रिपोर्टर की बात: छत्तीसगढ़ के वातावरण में बढ़ रही यह गर्मी सिर्फ हवा तक सीमित नहीं है, यह हमारी धरती की कोख को सुखा रही है। जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के इस दौर में अगर अपनी खेती और फसलों को बचाना है, तो सबसे पहले मिट्टी को जीवंत और उपजाऊ बनाए रखना होगा। यही आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

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