जयप्रकाश मानस का लघु कथाओं का संग्रह दो कतार पीछे हमारे समय की विडंबनाओं की ऐसी दास्तान है जो हमारे समय के सच का साक्षात्कार करती है। जयप्रकाश मानस मूलत: कवि हैं किन्तु उनके लेखन का क्षेत्र बहुत व्यापक है।
लघु कथा लिखना बहुत कठिन काम है क्योंकि इसकी बहुत सारी अलिखित शर्ते हैं। सबसे महत्वपूर्ण कठिनाई यह है कि इसमें 300 से 500 शब्दों के भीतर एक पूरी कहानी कहनी है जो प्रभावी हो और पाठक को भीतर तक छू जाए। हालाँकि शब्दों की ऐसी कोई सीमा तय नहीं है लेकिन ज्यादातर लघु कथा को इतने ही शब्दों के भीतर देखा और पढ़ा जाता रहा है। अंग्रेजी में तो किसी भी कहानी को ही शॉर्ट स्टोरी ही कहते हैं। लघु कथा का वहाँ अलग से कोई नाम नहीं रखा गया है।
लघु कथा का आकार छोटा होने से ज्यादातर लेखकों को यह भ्रम हो जाता है कि यह बहुत आसान विधा है। लघु कथा लिखना एक तनी हुई रस्सी पर चलने जैसा है।
मैंने कई लेखकों की लघु कथाएँ पढ़ी हैं। उनमें से कुछ तो ऐसे लेखक भी मिले जिनके लघु कथाओं के दो-दो संग्रह आ गए हैं। उनको लघु कथा पर पुरस्कार मिल गए लेकिन जब मैंने उनकी लघु कथाएँ पढ़ीं तो मुझे अचरज हुआ कि वह लघु कथाएँ नहीं लघुकथा की स्थिति है।
इस बात को एक-दो उदाहरण से थोड़ा सा स्पष्ट करना चाहूँगा। जैसे कि एक सज्जन ने, एक लेखक ने मुझे अपनी एक लघुकथा पढऩे के लिए दी जिसमें वर्णन था कि माँ की मृत्यु के बाद परिवार द्वारा श्राद्ध पर खूब सारे ब्राह्मणों को भोज कराया जाता है। दान पुण्य दिया जाता है लेकिन अपने जीवन में वह बहुत दुखी थी। उनकी कोई देखभाल करने वाला नहीं था। पुत्रों ने उनकी कोई परवाह नहीं की। लेखक ने मुझसे पूछा कि लघुकथा कैसे लगी तो मैंने कहा कि यह तो लघुकथा की स्थिति है। लघुकथा तो इसके बाद शुरू होगी। आपने जो लिखा है, सही लिखा है। ऐसा होता है। सब दूर अक्सर होता है। यह तो कथा की स्थिति बनी है लेकिन इसमें कथा नहीं है क्योंकि लघु कथा में कोई एक घटना, कोई एक मार्मिक अंत या कोई एक प्रभावी संवाद होता है जो पूरी कथा के दबे हुए अर्थ को प्रकट करता है। आपकी लघुकथा तो निबंध का छोटा रूप हो गई है। उन्हें मेरी बात से अचरज हुआ और दुख भी हुआ। उन्होंने कहा मेरी दो किताबें आ चुकी हैं। मुझे लघुकथा पर पुरस्कार मिल चुका है लेकिन ऐसी बात मुझे आज तक किसी ने कही नहीं।
तो मैं उनसे कहा कि जिन्होंने नहीं कहा तो मान लीजिए कि वे आपके शत्रु हैं। मैं आपका मित्र हूँ इसलिए आपको सही बात बता रहा हूँ। लोग गलत या झूठी तारीफ करके भी शत्रुता निभाते हैं।
एक और मित्र ने मुझे लघुकथा सुनाई। वहाँ भी यही हाल था। उन्होंने मुझे एक लघुकथा सुनाई। परीक्षा के दिन आते हैं तो विद्यार्थी मंदिरों में जाकर घंटी बजाते हैं। प्रार्थना करते हैं। भगवान को भोग लगाते हैं और पास होने पर प्रसाद चढ़ाने का आश्वासन देते हैं। इस तरह की निबंधात्मक वर्णन सुनाने के बाद मुझसे कहा कि बताओ लघुकथा कैसी है? उनसे भी मैं यही कहा कि यह तो कथा की स्थिति है। आपने जो कहा वह बिल्कुल ठीक है। विद्यार्थी ऐसा ही करते हैं लेकिन यह बहुत आम बात है। इसमें कहानी कहाँ है? कहानी अब इसके बाद शुरू होगी। वह लिखकर बताओ! ऐसी स्थितियों में कोई एक विडंबना पैदा होती है। कोई एक व्यंग्य पैदा होता है। कोई अजीब सी घटना होती है जिससे पाठक प्रभावित होता है जो उसके मर्म को छूती है। ऐसा कुछ लिखकर बताओ। लघुकथा और निबंध में फर्क होता है। आपने स्थितियों को ठीक से पकड़ा है लेकिन स्थिति में कहानी नहीं डाल पाए। कथा नहीं है।
इसके उदाहरण में मैं जयप्रकाश मानस की कुछ लघु कथाओं की बात कहना चाहूँगा।
बलराम अग्रवाल जी ने भी उस और संकेत किया है जैसे उनके एक लघु कथा है जिसमें जूते के फटे हिस्से से अंगूठा बाहर दिख रहा है। यहाँ जो दयनीय स्थिति बन रही है वह अधूरी रहती यदि कोने में टूटी हुई चप्पल का दृश्य ना होता तो। उस दृश्य ने उस विडम्बना को पूरा किया है। एक लघुकथा है ‘माँ की चूडिय़ाँ यह लघुकथा अपने नरेशन में उस जगह पूरी होती है जब वह कहती है कि मैंने आज एक दूसरे की माँ को उठाया। यदि यह एक पंक्ति ना होती तो लघुकथा बहुत सामान्य होती। इसीलिए मैं कह रहा था कि कोई एक पंक्ति, कोई एक ऐसी बात लघुकथा में शामिल होती है जो उसे कहानी बनाती है।
‘सभा और तालियाँ लघुकथा भी ऐसी ही है। ताली एक प्रतीक बनकर आती है जो व्यक्ति के अपराध बोध को प्रकट करती है। सत्ता के सामने ज्ञान दास की तरह प्रकट होता है और अकेले में अपराध बोध की तरह। धूमिल की कविता है- जैसे खेत में सूअर वैसे दीमाग में पैसा। इसी तरह जयप्रकाश की बहुत सी लघुकथाओं का भाव है । छोटे में बड़ी बात बात कहने की क्षमता उनके लेखन में है ।इस संदर्भ में मै हरिशंकर परसाई की कुछ लघुकथाओं को याद करता हूँ जिन पर पूरे देश में नाट्य मंचन भी होते हैं।
जाति “अश्लील पुस्तकें” “चूहा और मैं “जैसी बहुत सी रचनाएं है।
जयप्रकाश मानस बची हुई हवा के बाद दो कतार पीछे की लघु कथाओं का दूसरा संग्रहण है। उनके अब तक चार कविता संग्रह-तभी होती है सुबह, होना ही चाहिए आंगन, अकोले के विरुद्ध, सपनों के करीब दो आंखे, कविता कभी होती नहीं पुरानी, स्थगित है प्रेम। इसके अलावा- निबंध संग्रह, आलोचना, बाल कविताएं- छत्तीसगढ़ी लोककाएं- (10 भाग) लोकगीत, विज्ञान छत्तीसगढ़ी में व्यंग्य संग्रह कलादास के कलाकारी बलरामजी के शब्दों में कहे तो जयप्रकाश मानस की लघुकथाएं- लघुकथा जीवन के एकांश का साक्षात्कार है, किसी एक दृश्य की वीडियोग्राफी, व्याधिग्रसन किसी एक अंत: अंग का एक्टेशन है।
बक़ौल जयप्रकाश मानस- लघु कथा इस मामले में भी लघु कि वह घाव गंभीर करती है। लघु कथा दोहे, गजल की तरह ऐसी विधा है जिसमें प्रत्येक शब्द की विश्वसनीय दर्ज होती है। लघु कथा यथार्थ का दर्पण है। जयप्रकाश मानस के लघुकथा संग्रह में संकल्पित 110 लघुकथाओं में से बहुत सारी तीखी टिप्पणियां भी देखने मिलती है। किताब का मोल पढ़ते हुए परसाई का प्रेमचदं के फटे जूते की याद आती है।