बेंगलुरु/अहमदाबाद। देश में कोरोना वायरस की तबाही के बाद अब एक और खतरनाक वायरस ने दस्तक देकर सरकार और आम जनता की धड़कनें बढ़ा दी हैं। पिछले कुछ दिनों में बेंगलुरु और गुजरात के वडोदरा में ‘इबोला’ वायरस (Ebola Virus Scare India) के दो संदिग्ध मरीज मिलने से हड़कंप मच गया। राहत की बात यह रही कि पुणे की एनआईवी लैब (NIV Pune Lab) में दोनों की टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आई है, लेकिन इस घटना ने देश की सुरक्षा और एयरपोर्ट स्क्रीनिंग पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बेंगलुरु और वडोदरा में मिले संदिग्ध (Ebola Suspects in Bengaluru and Vadodara)
पहला मामला कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु का है। यहाँ 23 मई को युगांडा (Uganda Africa) से आई एक 28 वर्षीय महिला अहमदाबाद होते हुए केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Kempegowda International Airport) पर उतरी। एयरपोर्ट पर थर्मल स्कैनिंग के वक्त उसे कोई बड़ा लक्षण नहीं था। लेकिन होटल पहुंचते ही उसे तेज बदन दर्द और थकावट होने लगी। शक होने पर उसे तुरंत ‘एपिडेमिक डिसीजेस हॉस्पिटल’ में आइसोलेट किया गया।
दूसरा मामला गुजरात के वडोदरा से सामने आया। कांगो (Congo Africa) देश के दो नागरिक बिजनेस ट्रिप पर भारत आए थे। ये लोग मुंबई, सिलवासा और दमन घूमते हुए 22 मई को वडोदरा पहुंचे। यहाँ 37 साल के एक विदेशी नागरिक की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। उसे तुरंत आइसोलेशन वार्ड (Isolation Ward Gujarat) में भर्ती कराया गया। प्रशासन ने सुरक्षा के लिहाज से उसके संपर्क में आए 20 अन्य लोगों को भी क्वारंटीन कर दिया है।
ग्लोबल इमरजेंसी के बीच ढिलाई क्यों? (Global Health Emergency and Travel Ban)
गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल्ल पनशेरिया का कहना है कि रिपोर्ट निगेटिव है और चिंता की कोई बात नहीं है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आती तो क्या होता? ये विदेशी नागरिक पिछले 10 दिनों से भारत के कई शहरों में घूम रहे थे, ऐसे में ये ‘सुपर-स्प्रेडर’ (Super Spreader Risk) बन सकते थे। जब अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों ने प्रभावित अफ्रीकी देशों पर पूरी तरह ट्रैवल बैन (Travel Ban on African Countries) लगा दिया है, तो भारत इतनी ढिलाई क्यों बरत रहा है?
मौत का दूसरा नाम है इबोला (Ebola Death Rate and Bundibugyo Strain)
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, कोरोना वायरस में मृत्यु दर महज 1 फीसदी थी, फिर भी उसने पूरी दुनिया को तबाह कर दिया था। इसके उलट इबोला वायरस में मौत की दर 50 से 60 प्रतिशत तक होती है। यानी हर दूसरा संक्रमित मरीज दम तोड़ देता है। अफ्रीका में फैला मौजूदा ‘बुंडीबुजो स्ट्रेन’ (Bundibugyo Strain) भी बेहद खतरनाक है। डराने वाली बात यह है कि 50 साल बाद भी इबोला का कोई सटीक इलाज या पक्की वैक्सीन मौजूद नहीं है।
एयरपोर्ट स्क्रीनिंग क्यों है फेल? (Asymptomatic Cases Risk at Airports)
आईसीएमआर (ICMR Study on Airport Screening) की एक पुरानी रिपोर्ट बताती है कि एयरपोर्ट पर केवल उन्हीं मरीजों की पहचान हो पाती है जिनमें लक्षण दिखते हैं। लेकिन जिन संक्रमितों में लक्षण छिपे होते हैं (Asymptomatic Cases), वे आसानी से बाहर निकल जाते हैं और समाज में वायरस फैला देते हैं। ऐसे में सिर्फ थर्मल स्कैनिंग के भरोसे रहना भारत को किसी बड़ी मुसीबत में डाल सकता है।