कृष्ण कुमार सिकंदर, रायपुर
छत्तीसगढ़ में अपराध का चेहरा तेजी से बदल रहा है। अब अपराध केवल बंदूक, चाकू या खुलेआम लूट तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि मुस्कुराते चेहरों, सोशल मीडिया प्रोफाइलों और प्रेम के झूठे वादों के पीछे छिपकर लोगों की जिंदगी में दाखिल हो रहा है। फेसबुक की फ्रेंड रिक्वेस्ट से शुरू होने वाली बातचीत कब किसी कारोबारी, अफसर या आम नागरिक को ब्लैकमेलिंग और फिरौती के जाल में फंसा दे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य में सामने आए हनी ट्रैप के मामलों ने यह साबित कर दिया है कि अपराधियों ने तकनीक, भावनाओं और सामाजिक प्रतिष्ठा तीनों को हथियार बना लिया है।
छत्तीसगढ़ में हनी ट्रैप की घटनाएं केवल कुछ सनसनीखेज अपराध नहीं हैं, बल्कि यह उस बदलते अपराध तंत्र का संकेत हैं जिसमें डिजिटल दुनिया इंसानी कमजोरियों का सबसे बड़ा शिकारी बन चुकी है। प्रेम, भरोसा और आकर्षण का भ्रम पैदा कर लोगों को फंसाना और फिर उनसे मोटी रकम वसूलना अब संगठित अपराध का हिस्सा बनता जा रहा है। वर्ष 2019 में रायपुर में सामने आया मामला लंबे समय तक चर्चा में रहा। एक युवती ने सोशल मीडिया के जरिए एक व्यवसायी से संपर्क किया। बातचीत दोस्ती में बदली और फिर मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ। कारोबारी को शायद अंदाजा भी नहीं था कि जिस रिश्ते को वह निजी समझ रहा है, वही उसकी सबसे बड़ी परेशानी बन जाएगा। युवती ने कथित तौर पर उसके अश्लील वीडियो और फोटो तैयार किए और फिर ब्लैकमेलिंग शुरू हुई। बदनामी के डर ने व्यवसायी को इतना मजबूर कर दिया कि उससे एक करोड़ 38 लाख रुपये से अधिक की रकम वसूली गई। यह मामला केवल आर्थिक अपराध नहीं था, बल्कि उस मानसिक दबाव की कहानी भी था जिसमें प्रतिष्ठा बचाने के लिए लोग चुप्पी साध लेते हैं।
इसी दौरान मध्य प्रदेश के चर्चित श्वेता जैन हनी ट्रैप गिरोह का खुलासा हुआ, जिसकी गूंज छत्तीसगढ़ तक पहुंची। जांच में सामने आया कि गिरोह की डायरी में छत्तीसगढ़ के कई रसूखदार लोगों, पूर्व मंत्रियों और अधिकारियों के नाम दर्ज थे। इससे यह संकेत मिला कि हनी ट्रैप केवल व्यक्तिगत ब्लैकमेलिंग तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता और प्रभावशाली नेटवर्क तक पहुंचने का जरिया भी बन चुका है। जांच एजेंसियों के अनुसार गिरोह के साइबर एक्सपर्ट्स ने कुछ अधिकारियों को कई वर्षों तक ब्लैकमेल किया। मोबाइल चैट, वीडियो कॉल रिकॉर्डिंग और निजी तस्वीरों को हथियार बनाकर लोगों को डराया जाता रहा। कई पीड़ित सामाजिक बदनामी के डर से सामने तक नहीं आए।
हनी ट्रैप की सबसे खतरनाक बात यही है कि इसमें अपराधी हथियार नहीं, बल्कि इंसान की भावनाओं और कमजोरियों का इस्तेमाल करते हैं। सोशल मीडिया पर फर्जी पहचान बनाना, आकर्षक प्रोफाइल तैयार करना और धीरे-धीरे विश्वास जीतना — यह पूरा खेल बेहद योजनाबद्ध तरीके से चलता है। कई बार पीड़ित को तब तक एहसास नहीं होता कि वह जाल में फंस चुका है, जब तक उसके सामने पैसे की मांग या वीडियो वायरल करने की धमकी नहीं आ जाती।
करीब पांच वर्षों तक अपेक्षाकृत खामोशी रहने के बाद वर्ष 2024 में बलौदाबाजार में सामने आए मामले ने राज्य को फिर चौंका दिया। यहां एक प्रधान आरक्षक समेत सात लोगों का गिरोह पकड़ा गया, जो कथित तौर पर लोगों को झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देकर और हनी ट्रैप के जरिए ब्लैकमेल करता था। इस मामले ने लोगों के भीतर नया भय पैदा किया, क्योंकि आरोप केवल बाहरी अपराधियों पर नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था से जुड़े व्यक्ति पर भी लगे। जब सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा रहे लोग ही ऐसे मामलों में शामिल पाए जाते हैं, तो आम नागरिक का भरोसा भी कमजोर पड़ने लगता है।
इसके बाद वर्ष 2025 में जांजगीर-बिलासपुर कनेक्शन सामने आया। बसंतपुर के एक व्यापारी की सोशल मीडिया पर आयशा बेगम नाम की युवती से दोस्ती हुई। बातचीत बढ़ी और मुलाकात तय हुई। व्यापारी जब मिलने पहुंचा तो उसे कमरे में बंधक बनाकर फिरौती मांगी गई। यह मामला किसी फिल्मी कहानी जैसा जरूर लगता है, लेकिन इसके पीछे वह कठोर सच्चाई है जिसमें सोशल मीडिया अब अपराधियों के लिए सबसे आसान शिकारगाह बन चुका है।
इस बीच मध्य प्रदेश के चर्चित हनी ट्रैप कांड की आरोपी श्वेता जैन के फिर सक्रिय होने की खबरों ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। बताया जा रहा है कि वह इंदौर के एक शराब कारोबारी से जुड़े नए मामले में फिर चर्चा में है। कई नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स को अपने जाल में फंसा चुके नेटवर्क के फिर सक्रिय होने से आशंका बढ़ गई है कि ऐसे गिरोह लगातार नए रूपों में सामने आ रहे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि हनी ट्रैप अब केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं रहा। कई मामलों में इसके जरिए आर्थिक उगाही, राजनीतिक दबाव और गोपनीय सूचनाएं हासिल करने की कोशिश भी की जाती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, एन्क्रिप्टेड चैट एप्स और डिजिटल पेमेंट सिस्टम ने इस अपराध को और अधिक जटिल बना दिया है। अपराधी अक्सर फर्जी सिम कार्ड, नकली पहचान और अलग-अलग राज्यों में फैले नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं, जिससे जांच मुश्किल हो जाती है।
छत्तीसगढ़ में ऐसे मामलों की जांच मुख्य रूप से पुलिस की साइबर विंग द्वारा की जाती है। साइबर विशेषज्ञ डिजिटल चैट, आईपी एड्रेस, बैंक ट्रांजेक्शन और सोशल मीडिया गतिविधियों की मदद से आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई पीड़ित सामाजिक बदनामी के डर से शिकायत दर्ज नहीं कराते। यही चुप्पी अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत बन जाती है।
समाजशास्त्रियों के अनुसार डिजिटल युग में लोग तेजी से वर्चुअल रिश्तों पर भरोसा करने लगे हैं। अकेलापन, दिखावटी जीवनशैली और निजी जीवन की गोपनीयता में कमी ने लोगों को अधिक संवेदनशील बना दिया है। अपराधी इन्हीं मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का फायदा उठाते हैं।
आज जरूरत केवल अपराधियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि लोगों को जागरूक करने की भी है। सोशल मीडिया पर हर मुस्कुराती तस्वीर भरोसे के लायक नहीं होती। अनजान लोगों से निजी जानकारी साझा करना, वीडियो कॉल पर असावधानी बरतना या जल्दबाजी में भावनात्मक संबंध बनाना भारी पड़ सकता है। यह चेतावनी है कि अपराध अब चेहरे बदल चुका है। यह अपराध मोबाइल स्क्रीन और नकली रिश्तों के पीछे छिपा बैठा है। प्रेम का भ्रम पैदा कर भय का कारोबार करने वाले ये गिरोह केवल पैसे नहीं लूटते, बल्कि लोगों का आत्मविश्वास, सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक शांति भी छीन लेते हैं।