बस्तर के जंगलों में 3 दशक तक आदिवासियों की सेवा करने वाले गोडबोले दंपत्ति को मिला ‘पद्म श्री’ सम्मान

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में पिछले तीस वर्षों से आदिवासी समाज के स्वास्थ्य और पोषण के लिए समर्पित गोडबोले दंपत्ति की निस्वार्थ जनसेवा को आखिरकार देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिल गया है。 राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक गरिमामय समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी पत्नी सुनीता गोडबोले को संयुक्त रूप से ‘पद्म श्री’ पुरस्कार से नवाजा। उन्हें यह राष्ट्रीय सम्मान बस्तर के घोर नक्सल प्रभावित और सुदूर अंचलों में जनजातीय स्वास्थ्य, कुपोषण उन्मूलन और बाल विकास के क्षेत्र में ऐतिहासिक सुधार लाने के लिए दिया गया है。

मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले डॉ. रामचंद्र (आयुर्वेद चिकित्सक) और सुनीता गोडबोले (सोशल वर्क ग्रेजुएट) ने साल 1990 में विवाह के बंधन में बंधने के बाद ऐशो-आराम की जिंदगी चुनने के बजाय बस्तर के दंतेवाड़ा और अबूझमाड़ जैसे बेहद पिछड़े इलाकों में जाने का फैसला किया था。 उस दौर में इन इलाकों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं थीं。

बारसूर के छोटे से क्लिनिक से राष्ट्रपति भवन तक का सफर
गोडबोले दंपत्ति ने अपने सेवा कार्य की शुरुआत बारसूर क्षेत्र में एक छोटे से क्लिनिक से की, जहां उन्होंने स्थानीय आदिवासियों का मुफ्त इलाज करना शुरू किया。 कई बार दवाइयां और मदद पहुंचाने के लिए यह दंपत्ति घने जंगलों और पहाड़ों के बीच कई किलोमीटर पैदल चलकर भी मरीजों तक पहुंचता था。

3 हजार से अधिक गंभीर मरीजों का इलाज: डॉ. गोडबोले ने अपने शुरुआती 12 वर्षों के दौरान 3,000 से अधिक गंभीर रूप से बीमार ग्रामीणों का सफल इलाज किया。

सैकड़ों मेडिकल कैंप: उन्होंने बस्तर के अंदरूनी इलाकों में 114 से ज्यादा बड़े चिकित्सा शिविर आयोजित किए, जिनमें 9,000 से अधिक आदिवासियों के स्वास्थ्य की जांच की गई。

रायपुर तक इलाज की सुविधा: लगभग 400 ऐसे गंभीर मरीज, जिनका इलाज बस्तर में संभव नहीं था, उन्हें स्वयं के खर्च और प्रयासों से रायपुर के चैरिटेबल अस्पतालों तक ले जाकर ठीक करवाया。

गोंडी-हलबी भाषा सीखकर जीता ग्रामीणों का दिल
शुरुआती दिनों में बाहरी होने के कारण स्थानीय आदिवासियों का भरोसा जीतना एक बड़ी चुनौती थी。 इसके लिए सुनीता गोडबोले ने विशेष रूप से स्थानीय ‘गोंडी’ और ‘हलबी’ भाषाएं सीखीं। इसके बाद उन्होंने गांव-गांव जाकर आदिवासी महिलाओं को कुपोषण, स्वच्छता और सुरक्षित प्रसव के प्रति जागरूक किया。

उनके द्वारा संचालित “बनफूल” संगठन आज बस्तर के तीन जिलों के 37 स्कूलों में करीब 2,000 बच्चों को हर साल स्वास्थ्य और शिक्षा से जोड़ रहा है。 पिछले 5 वर्षों में इस दंपत्ति ने 24 गांवों के 460 बच्चों को गंभीर कुपोषण के चंगुल से सुरक्षित बाहर निकाला है。

सिकल सेल और बालिका शिक्षा पर विशेष फोकस
इलाज के साथ-साथ इस दंपत्ति ने बस्तर में पैर पसार रही सिकल सेल एनीमिया बीमारी के प्रति जागरूकता अभियान चलाया。 इसके साथ ही उन्होंने आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा और बाल अधिकारों की रक्षा के लिए भी कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं。

पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने दी बधाई
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी पद्म पुरस्कार विजेताओं को बधाई देते हुए कहा कि गोडबोले दंपत्ति जैसे कर्मठ लोग देश की आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महान प्रेरणा हैं。 वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि यह पुरस्कार जमीन पर वास्तविक बदलाव लाने वाले सच्चे नायकों का सम्मान है。 गौरतलब है कि इस वर्ष देश में कुल 131 पद्म पुरस्कार दिए गए हैं, जिनमें 5 पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्म श्री शामिल हैं。

छत्तीसगढ़ सरकार ने इस सम्मान को पूरे प्रदेश के लिए गौरव का क्षण बताते हुए कहा कि यह गोडबोले दंपत्ति के त्याग और बस्तर के आदिवासी समाज के संघर्ष की एक बड़ी राष्ट्रीय पहचान है

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