विशेष संवाददाता,
रायपुर। छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा विभाग और विभिन्न विश्वविद्यालयों के बीच प्रशासनिक कुशलता का इस कदर अभाव दिख रहा है कि पूरी व्यवस्था ही पटरी से उतर चुकी है। प्रदेश में नई शिक्षा नीति (NEP) को लागू तो कर दिया गया, लेकिन इसके क्रियान्वयन को लेकर जमीनी स्तर पर भारी भ्रम और विसंगति की स्थिति निर्मित हो गई है। आलम यह है कि हर विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में शीर्ष अधिकारियों से लेकर प्राचार्यों तक, सभी अपनी सुविधानुसार मनमाने आदेश जारी कर रहे हैं और उनका पालन भी अलग-अलग ढंग से कराया जा रहा है।
यूनिवर्सिटीज़ में विरोधाभास: कहीं जून में परीक्षा, कहीं मई से शुरुआत
प्रदेश के विश्वविद्यालयों में एकरूपता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। एक तरफ जहां बस्तर यूनिवर्सिटी में परीक्षाएं जून महीने में आयोजित होनी हैं और वहां अब भी अतिथि प्राध्यापकों की सेवाएं ली जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में 20 मई से ही परीक्षाएं शुरू हो रही हैं और वहां अतिथि प्राध्यापकों की सेवाएं अचानक स्थगित कर दी गई हैं। बिलासपुर और अन्य क्षेत्रों के महाविद्यालयों में भी ज्वाइनिंग और सेवामुक्ति को लेकर कोई निश्चित कैलेंडर नहीं है; हर जगह प्राचार्यों की मर्जी के मुताबिक अलग-अलग तिथियों में सेवाएं रखी और हटाई जा रही हैं।
11 माह की पॉलिसी बनाम प्राचार्यों की तानाशाही
नई शिक्षा नीति की गाइडलाइंस में अतिथि प्राध्यापकों को 11 माह तक सेवा में रखने का स्पष्ट प्रावधान बताया जा रहा है। इसका एक उदाहरण तब सामने आया जब बालोद के एक महाविद्यालय से अतिथि प्राध्यापक को 5 मई को ही निकाल दिया गया था, जिसके बाद अपील होने पर उच्च स्तर (परिधि) से उन्हें पुनः 11 माह तक रखने के निर्देश दिए गए। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर कॉलेज प्रबंधन इस नीति को ताक पर रखकर काम कर रहे हैं।
क्रेडिट और कालखंड का उलझा गणित: भुगतान रोकने का बना बहाना
सबसे बड़ी विसंगति अतिथि प्राध्यापकों के मानदेय भुगतान में सामने आ रही है। प्रदेश में कहीं कालखंड (पीरियड) के अनुसार, कहीं प्रतिदिन के घंटे के हिसाब से, तो कहीं क्रेडिट सिस्टम के आधार पर भुगतान किया जा रहा है।
कोर्स अधूरा रहने का ठीकरा अतिथि प्राध्यापकों पर:
क्रेडिट के हिसाब से 20 अप्रैल तक का काम पूरा कर डेली डायरी में लिखने का दबाव बनाया गया। इस नियम के चक्कर में स्नातक (UG) स्तर पर 124 से लेकर 192 तक क्रेडिट बच गए। जानकारों का कहना है कि क्रेडिट के हिसाब से पीरियड तय करने पर ग्रामीण और छोटे कॉलेजों में तय समय के भीतर कोर्स पूरा होना असंभव है। अब कोर्स पूरा नहीं होने का ठीकरा अतिथि प्राध्यापकों पर फोड़कर, सीनियर प्राध्यापक और प्राचार्य उनका भुगतान रोकने या आधा करने की बदमाशी कर रहे हैं।
ग्रामीण अंचलों में भीषण गर्मी के बीच ₹50,000 के स्थान पर मात्र ₹25,000 थमाने के लिए सीनियर प्राध्यापकों द्वारा प्राचार्यों को गुमराह किया जा रहा है।
हाजिरी के तीन नियम, पर भुगतान में पेंच: पीरियड वाइज सेवाओं पर संकट
महाविद्यालयों में प्रशासनिक ढर्रे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अतिथि प्राध्यापकों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए भी कोई एक नियम नहीं है। कुछ महाविद्यालयों में प्राध्यापकों से बायोमेट्रिक मशीन पर अंगूठा लगवाया गया, कुछ जगहों पर बकायदा ऐप के माध्यम से फोटो खींचकर अटेंडेंस ली गई, तो वहीं कुछ कॉलेजों ने पारंपरिक रूप से रजिस्टर में हस्ताक्षर करवाए। इस तरह हर तकनीकी और कागजी रिकॉर्ड दुरुस्त रखने के बावजूद भुगतान के वक्त नियमों को उलझा दिया जाता है। हकीकत यह है कि अतिथि प्राध्यापकों की सेवाएं पूरी तरह ‘पीरियड वाइज’ (कालखंड के अनुसार) हैं और नियमतः उन्हें उनके द्वारा दिए गए समय के हिसाब से ही भुगतान होना चाहिए, लेकिन जमीनी स्तर पर इस स्पष्ट नियम की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
मुंह खोलने पर सर्विस रिकॉर्ड खराब करने की धमकी!
महाविद्यालयों में प्रशासनिक अक्षमता को छुपाने के लिए अब ‘साम-दाम-दंड-भेद’ और डराने-धमकाने की राजनीति शुरू हो चुकी है। जब अतिथि प्राध्यापक इस विसंगति और आर्थिक शोषण के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो प्राचार्यों और सीनियर स्टाफ द्वारा उन्हें सीधे चेतावनी दी जा रही है कि “अपना मुंह और कलम बंद रखें, अन्यथा सर्विस रिकॉर्ड में नंबरिंग खराब कर दी जाएगी।” नौकरी जाने के डर से ग्रामीण क्षेत्रों के विद्वान मूकदर्शक बनकर जुल्म सहने को मजबूर हैं।
भीषण गर्मी में परीक्षाएं: सीनियर प्रोफेसर मनाएंग छुट्टियां, गैर-शैक्षणिक स्टाफ कराएगा एग्जाम
उच्च शिक्षा विभाग के तुगलकी फरमान का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब सेमेस्टर और वार्षिक परीक्षाएं मई के अंत और जून में होनी हैं, तब विभाग 15 मई से सीनियर प्राध्यापकों को ग्रीष्मकालीन अवकाश (गर्मी की छुट्टी) दे रहा है।
सवाल यह उठता है कि जब प्राध्यापक छुट्टी पर होंगे, तो यूनिवर्सिटी की परीक्षाएं और प्रैक्टिकल कौन संपन्न कराएगा?
जमीनी हकीकत यह होने वाली है कि अब परीक्षाएं प्राचार्य, प्रयोगशाला परिचारक, भृत्य (चपरासी), बाबू और कई जगहों पर कम पढ़े-लिखे या बाहरी लोगों को बुलाकर संपन्न कराई जाएंगी। शिक्षा की गुणवत्ता और परीक्षा की गोपनीयता पूरी तरह दांव पर लग चुकी है।
DPI और उच्च अधिकारियों के आदेशों में विरोधाभास
एक तरफ डीपीआई (DPI) का कहना है कि 20 अप्रैल से 15 जून तक ग्रीष्मकालीन अवकाश रहेगा, तो वहीं दूसरी तरफ अधिकारी कह रहे हैं कि पहली बार और पूरक परीक्षाओं के लिए पढ़ाई जारी रखें। इस अंतहीन विरोधाभास ने पूरे प्रदेश के शैक्षणिक माहौल को भ्रम के जाल में धकेल दिया है। निचले स्तर पर प्रशासन (कॉलेज प्रबंधन) लगातार तानाशाही कर रहा है, जबकि उच्च स्तर पर बैठे अधिकारी समाचार पत्रों में रोज छप रही इन खबरों के बावजूद मौन साधे हुए हैं।
निष्कर्ष: छत्तीसगढ़ की उच्च शिक्षा व्यवस्था इस समय गंभीर प्रशासनिक संकट से गुजर रही है। मूल्यांकन और समीक्षा की सुई जहां 80% पर टिकी है, वहीं पास होने का पैमाना अभी भी वही पुराना 33% है। यदि राज्य सरकार और उच्च शिक्षा विभाग ने इस ‘मल्टी-आदेश’ संस्कृति, उपस्थिति के विरोधाभासों और अतिथि प्राध्यापकों के आर्थिक शोषण पर तुरंत संज्ञान लेकर कोई एकरूप नीति नहीं बनाई, तो प्रदेश के लाखों छात्रों का भविष्य और शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।
नई शिक्षा नीति या ‘मनमर्जी की नीति? अतिथि प्राध्यापक और परीक्षाएं राम भरोसे
17
May