बाँसला के बाद सितलपुर में भी हाल-बेहाल
भानुप्रतापपुर। वन विभाग के कार्य को तो आप जानते ही हैं…” यह हम नहीं, बल्कि खुद दुर्गुकोंदल के वन परिक्षेत्र अधिकारी सतीश मिश्रा कह रहे हैं। भानुप्रतापपुर पूर्व वन मंडल के अंतर्गत आने वाले दुर्गुकोंदल वन परिक्षेत्र के सितलपुर जंगल में चल रहा एएनआर कार्य इन दिनों भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ चुका है। कागजों पर काम ‘चकाचक’ है, सप्लायर की जेबें मार्च महीने में ही पूरी तरह से भर दी गई हैं, लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि जंगल आज भी असुरक्षित है। ग्रामीण तंज कस रहे हैं “साहब, पोल तो लग गया है, अब जरा तार भी खिंचवा दो!”
पिछले वर्ष सितलपुर जंगल के 117 हेक्टेयर क्षेत्र में कूप कटाई का कार्य किया गया था। इसके बाद नियमानुसार यहां छोटे पौधों को संरक्षित करने के लिए एएनआर कार्य व साफ-सफाई और फेंसिंग किया जाना था। महीनों तक मौके पर सिर्फ गिट्टी, सीमेंट और पोल ही लावारिस हालत में पड़े रहे। भारी दबाव के बाद हाल ही में केवल पोल लगाने का काम किया गया है। लेकिन बिना फेंसिंग तार के ये पोल महज़ शो-पीस बने हुए हैं। मार्च में ही सप्लायर को ‘पूर्ण भुगतान’, कछुआ गति से काम
नियमों को ताक पर रखकर मार्च महीने में ही मटेरियल सप्लायर को शत-प्रतिशत भुगतान कर दिया गया। भुगतान हुए महीनों बीत गए, लेकिन मौके पर आज तक फेंसिंग का तार नहीं पहुंचा है। बिना तार के फेंसिंग का काम अधर में लटका है। इसके अलावा, छोटे पौधों को बचाने के लिए की जाने वाली साफ-सफाई का काम भी ठप है।
अधिकारी-सप्लायर ‘कमीशन’ का खेल?
सूत्रों और ग्रामीणों की मानें तो वन विभाग में यह एक आम ढर्रा बन चुका है। काम शुरू होने या पूरा होने से पहले ही सप्लायरों को भुगतान कर दिया जाता है। इसके बाद अधिकारी अपना ‘कमीशन’ समेट लेते हैं। अंदरूनी क्षेत्र होने का फायदा उठाकर कई बार काम को आधा-अधूरा छोड़ दिया जाता है या सिर्फ फाइलों में ही समेट दिया जाता है, क्योंकि न तो कोई जमीनी सत्यापन करने पहुंचता है और न ही जांच होती है।
मजदूरों के नाम पर फर्जी ‘वाउचर’: ग्रामीणों का बड़ा खुलासा
इस पूरे खेल में सबसे स्याह पहलू है स्थानीय ग्रामीणों का शोषण और फर्जीवाड़ा। नाम न छापने की शर्त पर एक ग्रामीण ने वन विभाग के कारनामों की पोल खोलते हुए बताया वन विभाग के अधिकारी हमारे नाम से फर्जी मजदूरी वाउचर बनाते हैं। बैंक से राशि आहरण के बाद पूरी रकम अधिकारी खुद रख लेते हैं। इसके एवज में हमें चाय-नाश्ते के नाम पर महज कुछ रुपये थमा दिए जाते हैं। जिन मजदूरों ने कभी मौके पर पैर भी नहीं रखा, उनके नाम पर भी सरकारी खजाने से पैसा निकाला जा रहा है।
विरोधाभासी बयान: डिप्टी रेंजर और रेंजर की ‘अजीब’ दलीलें
इस मामले में वन विभाग के ही दो जिम्मेदार अधिकारियों के बयानों में भारी विरोधाभास देखने को मिल रहा है। डिप्टी रेंजर सीताप सिंह नरेटी ने कहा कि सारा काम लगभग पूरा हो गया है, बस तार लगाने का काम बचा है। जैसे ही तार गिरेगा, काम शुरू कर दिया जाएगा। परिक्षेत्र अधिकारी सतीश मिश्रा का गैर-जिम्मेदाराना जवाब देते हुए कहा कि सितलपुर एएनआर कार्य को लेकर रेंजर से सीधी जानकारी मांगी गई, तो उन्होंने बेहद लापरवाही से कहा, वन विभाग के कार्य को आप जानते तो हैं… पेमेंट तो हो गया है, सप्लायर ने अभी पूरा मटेरियल नहीं गिराया है।
फाइलों में सिमट कर रह गया दुर्गुकोंदल का जंगल
यह कोई पहला मामला नहीं है। दुर्गुकोंदल वन परिक्षेत्र के अंतर्गत एएनआर के तहत किए जाने वाले ऐसे कई कार्य हैं, जो धरातल पर आने से पहले ही ‘फाइलों में’ पूरे हो चुके हैं। अधिकारी और सप्लायर की जुगलबंदी के कारण शासन की लाखों-करोड़ों रुपये की योजनाएं सिर्फ कागजी आंकड़ों और कमीशनखोरी की भेंट चढ़ रही हैं। अब देखना यह होगा कि भानुप्रतापपुर वन मंडल के उच्च अधिकारी इस खुले भ्रष्टाचार पर संज्ञान लेकर जांच टीम बिठाते हैं, या फिर वन विभाग का काम तो ऐसा ही है कहकर इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।