गरियाबंद के छुरा में आर्शीवाद और गुप्ता क्लीनिक बिना परमिशन के अस्पताल चला रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी पर व्यंग्यात्मक रिपोर्ट।
गरियाबंद कहते हैं कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ नहीं होती, लेकिन गरियाबंद जिले के छुरा क्षेत्र में स्वास्थ्य विभाग की लाठी में तो शायद हरकत ही नहीं होती। यहाँ ‘सिस्टम’ इतना गहरा सोया है कि उसे जगाने के लिए अब शायद ढोल-नगाड़ों की नहीं, बल्कि किसी बड़े चमत्कार की ज़रूरत है। छुरा क्षेत्र में इन दिनों चिकित्सा जगत का एक अद्भुत ‘जादू’ देखने को मिल रहा है यहाँ परमिशन क्लीनिक की ली जाती है और रातों-रात वहाँ अस्पताल खड़ा हो जाता है।
कागजों में क्लीनिक,हकीकत में मल्टी-
स्पेशलिटी तमाशा
ताजा मामला चर्चा में है आर्शीवाद क्लीनिक का। नाम में तो आशीर्वाद है, लेकिन कायदे-कानूनों को यहाँ जो श्राप लगा है, उसे देखकर कानून भी शरमा जाए,जनाब के पास परमिशन है सिर्फ एक अदद मेडिकल स्टोर और छोटा सा क्लीनिक चलाने की, लेकिन हौसले इतने बुलंद हैं कि पूरा का पूरा अस्पताल ही तान दिया गया है। मरीज भर्ती हो रहे हैं, इलाज धड़ल्ले से चल रहा है और जान जोखिम में डालने का यह व्यापार खुलेआम फल-फूल रहा है।
जब इस चमत्कारी परिवर्तन के बारे में स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों से पूछा गया, तो जवाब मिला कि साहब ने आवेदन तो दिया है, पर अभी परमिशन मिली नहीं है। वाह, यह तो वही बात हुई कि दूल्हे ने शादी के लिए अर्जी दी है, पर उसने बिना फेरों के ही ससुराल में डेरा डाल दिया है। नियम और प्रक्रियाएं शायद गरियाबंद के स्वास्थ्य विभाग के लिए केवल फाइलों की शोभा बढ़ाने वाली वस्तुएं बनकर रह गई हैं।
गुप्ता जी का भी जलवा बरकरार
अगर आपको लगता है कि सिर्फ आर्शीवाद क्लीनिक ही इस रेस में अकेला है, तो आप गलत हैं। छुरा के बजरंग चौक में संचालित गुप्ता क्लीनिक भी इसी राह पर अग्रसर है। बिना किसी ठोस परमिशन के यहाँ भी अस्पताल का संचालन ऐसे किया जा रहा है जैसे कोई मोहल्ले की किराना दुकान हो। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी इस मामले में ऐसे अनभिज्ञ बने बैठे हैं, मानो उनके पास दिव्य दृष्टि की भारी कमी हो गई है। या फिर हो सकता है कि गरियाबंद स्वास्थ्य विभाग ने बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो के गांधीवादी सिद्धांत को कुछ ज़्यादा ही गंभीरता से ले लिया है।
आखिर मौन की वजह क्या?
सवाल यह उठता है कि क्या विभाग को वाकई खबर नहीं है? या फिर जान-बूझकर आँखों पर पट्टी बाँध ली गई है? जनता के बीच चर्चा है कि यह मौन मुफ्त में नहीं आता। पैसों की लालच और रसूख के आगे जब नियमों की बलि दी जाती है, तब ऐसे अवैध अस्पताल कुकुरमुत्ते की तरह उगने लगते हैं। छुरा क्षेत्र की भोली-भाली जनता की जान से खिलवाड़ करने का यह लाइसेंस आखिर इन संचालकों को किसने दिया?
कब जागेगा कुंभकर्णी स्वास्थ्य विभाग?
गरियाबंद स्वास्थ्य विभाग की यह अनदेखी किसी बड़े हादसे को न्योता दे रही है। आवेदन प्रक्रिया में होना, अवैध रूप से बेड लगाकर मरीजों को भर्ती करने का लाइसेंस नहीं होता। अगर समय रहते इन ‘बिना परमिशन’ वाले अस्पतालों पर ताला नहीं जड़ा गया, तो आने वाले समय में स्वास्थ्य विभाग की इस चुप्पी की गूंज बहुत कड़वी होगी। फिलहाल तो छुरा की जनता भगवान भरोसे है और विभाग आर्शीवाद और गुप्ता जैसे संस्थानों के आवेदन पर गहन चिंतन कर रहा है।