नई दिल्ली। भारतीय रेलवे लगातार आधुनिक तकनीक और बेहतर सुविधाओं के जरिए यात्रियों को सुरक्षित और आरामदायक सफर देने में जुटा है। रेलवे जहां वंदे भारत और अमृत भारत जैसी नई ट्रेनों का संचालन कर रहा है, वहीं पुराने कोचों को भी नए रंग-रूप में तैयार किया जा रहा है। इसी बीच ट्रेनों के अलग-अलग रंगों वाले कोच यात्रियों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि रेलवे के लाल, नीले और हरे डिब्बों के पीछे अलग-अलग संकेत और उद्देश्य छिपे होते हैं।
रेलवे में लाल रंग के कोच आमतौर पर एसी श्रेणी की बोगियों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें एसी चेयर कार, एसी थ्री टियर और एसी टू टियर जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं। लाल रंग प्रीमियम और आरामदायक यात्रा का प्रतीक माना जाता है। प्लेटफॉर्म पर यात्रियों को एसी कोच की पहचान आसानी से हो सके, इसलिए इन्हें अलग रंग दिया जाता है। इन डिब्बों में आधुनिक इंटीरियर और बेहतर सुविधाएं भी उपलब्ध होती हैं।
वहीं, हरे रंग के कोच मुख्य रूप से गरीब रथ जैसी ट्रेनों में देखने को मिलते हैं। गरीब रथ ट्रेनें कम किराए में वातानुकूलित सफर की सुविधा देती हैं। रेलवे ने इन ट्रेनों को अलग पहचान देने के लिए हरे रंग का इस्तेमाल किया। हरा रंग सुलभ और किफायती यात्रा का संकेत माना जाता है। इससे यात्रियों को ट्रेन की श्रेणी पहचानने में आसानी होती है।
नीले रंग के कोच भारतीय रेलवे की सबसे सामान्य पहचान बन चुके हैं। इनका उपयोग मुख्य रूप से स्लीपर और जनरल कोच में किया जाता है। बिना एसी वाले अधिकांश डिब्बे नीले रंग के होते हैं। रेलवे ने पुराने मैरून रंग की जगह नीले रंग को आधुनिक पहचान के तौर पर अपनाया था। यह रंग लंबी दूरी की सामान्य और किफायती यात्रा को दर्शाता है।
रेलवे के कोचों के रंग सिर्फ आकर्षण के लिए नहीं, बल्कि यात्रियों को सुविधाओं और श्रेणी की पहचान आसान बनाने के लिए तय किए जाते हैं। यही वजह है कि भारतीय रेलवे में हर रंग का अपना अलग महत्व है।